दुल्ला भट्टी बहादुर और दयालु इंसान थे ,जिन्होंने मुगल काल में गरीबों और कमजोरों के लिए लड़ाई लड़ी. लोहड़ी के दौरान उसे याद करना इंसाफ, इंसानियत और समाज के लिए खड़े होने की भावना को जिंदा रखने जैसा है.
ठिठुरन बढ़ने लगती है और खेतों में नई फसल की खुशबू फैलने लगती है, तब लोहड़ी का त्योहार लोगों के दिलों में खास जगह बना लेता है. खासकर पंजाब, हरियाणा और आसपास के इलाकों में लोहड़ी सिर्फ आग जलाने, रेवड़ी-मूंगफली बांटने या गीत गाने तक सीमित नहीं है. इस त्योहार के साथ जुड़ी है एक ऐसी कहानी, जो बहादुरी, इंसाफ और आम लोगों के लिए लड़ने की मिसाल बन चुकी है. यही कहानी है दुल्ला भट्टी की. लोहड़ी के गीतों में जब “सुंदर मुंदरिए हो” गूंजता है, तो उसके पीछे दुल्ला भट्टी का नाम अपने आप याद आ जाता है. लोग आज भी लोहड़ी के मौके पर उसे सम्मान के साथ याद करते हैं, जैसे वह कोई पुराना रिश्ता हो. सवाल उठता है कि आखिर दुल्ला भट्टी कौन थे ? क्या वह सिर्फ लोककथाओं का हिस्सा है या सच में कोई ऐसा इंसान था, जिसने समाज के लिए कुछ बड़ा किया? दुल्ला भट्टी की कहानी मुगल काल से जुड़ी मानी जाती है, जब आम लोग करों, जबरन वसूली और जुल्म से परेशान थे. ऐसे वक्त में दुल्ला भट्टी ने गरीबों और कमजोरों के हक में आवाज उठाई. यही वजह है कि वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि लोगों के लिए उम्मीद की पहचान बन गए . लोहड़ी पर उसे याद करना दरअसल इंसाफ और इंसानियत को याद करना है.
दुल्ला भट्टी का असली नाम राय अब्दुल्ला भट्टी बताया जाता है. वह पंजाब के एक जमींदार परिवार से थे और माना जाता है कि उनका जन्म 16वीं सदी में हुआ. उस समय मुगल शासन चल रहा था और आम लोगों पर भारी कर लगाए जाते थे. दुल्ला भट्टी का परिवार इन करों के खिलाफ खड़ा हुआ, जिसकी वजह से उन्हें सजा भी झेलनी पड़ी. परिवार पर हुए अन्याय ने दुल्ला भट्टी के मन में सत्ता के खिलाफ गुस्सा भर दिया. उन्होंने जंगलों और गांवों में रहकर अमीरों और शासकों के खिलाफ मोर्चा खोला. जो पैसा वह लूटता, उसे गरीबों में बांट देता. इसी वजह से लोग उन्हें पंजाब का “रॉबिन हुड” भी कहते हैं.
दुल्ला भट्टी सिर्फ लड़ाकू नहीं थे , बल्कि समाज के दर्द को समझने वाला इंसान थे. उस दौर में कई गरीब परिवार अपनी बेटियों की शादी तक नहीं कर पाते थे. कहा जाता है कि दुल्ला भट्टी ने ऐसी कई लड़कियों की शादी अपने खर्च पर करवाई. लोककथाओं में सुंदर और मुंदरी नाम की दो बहनों का जिक्र मिलता है, जिनकी शादी दुल्ला भट्टी ने करवाई थी. जिनका कन्यादान किया और उनकी शादी में मदद की. यही वजह है कि लोहड़ी के गीतों में सुंदर-मुंदरिए की कहानी आज भी गाई जाती है.
लोहड़ी का त्योहार आग, फसल और नए मौसम का स्वागत करता है. लेकिन इसके साथ-साथ यह त्योहार उन लोगों को याद करने का भी मौका देता है, जिन्होंने समाज के लिए कुछ किया. दुल्ला भट्टी की कहानी लोहड़ी से इसलिए जुड़ गई क्योंकि वह लोगों के बीच इंसाफ और बराबरी की उम्मीद लेकर आया. जब लोग लोहड़ी की आग के चारों ओर घूमते हैं और गीत गाते हैं, तो वे सिर्फ त्योहार नहीं मना रहे होते, बल्कि दुल्ला भट्टी की सोच को भी जिंदा रखते हैं. यह याद दिलाता है कि ताकत हमेशा सत्ता के पास नहीं होती, कभी-कभी आम इंसान भी बदलाव ला सकता है.पंजाबी लोकगीतों ने दुल्ला भट्टी को अमर बना दिया. “सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो” जैसे बोल बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की जुबान पर हैं. इन गीतों के जरिए नई पीढ़ी भी उसके बारे में जानती है. लोकगीतों में उसे बहादुर, दयालु और सच्चा इंसान बताया गया है. यही वजह है कि दुल्ला भट्टी इतिहास की किताबों से ज्यादा लोगों की यादों में जिंदा है.






