हमारी न्याय व्यवस्था के लिए यह निश्चित ही शर्म की बात है कि सभी जगह से निराश होकर व्यक्ति अदालत की चौखट पर न्याय मांगने पहुंचता है लेकिन उसे वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है। फिल्म जॉली एलएलबी-2 देखने वालों के सामने भी अदालतों में मुकदमों की फाइलों का ढेर दिखाई पड़ जाता है लेकिन उसके न्यायाधीश की यह बात भी जेहन में अंदर तक बैठी है कि जब कोई व्यक्ति सभी जगह से निराश हो जाता है तब यही कहता है कि आईबिलसीयू इन द कोर्टं अर्थात अब भी अदालत के प्रति विश्वास कायम है। यह विश्वास बना रहे इसके लिए देश में जस्टिस क्लाक नामक एक साफ्टवेयर तैयार कराया गया। इससे न्याय प्रक्रिया को बेहतर बनाने और अदालती प्रक्रिया में तेजी लाने का प्रयास किया जाएगा। न्याय में विलम्ब न्याय नहीं होता यह कहावत हम कहते भी हैं और सुनते भी हैं लेकिन न्याय में विलम्ब हो रहा है। इसके कई कारण हैं। इनको दूर करने के लिए केन्द्र से लेकर राज्य सरकारें तक चिंता जताती हैं लेकिन अभी तक अदालतों में मुकदमों की फाइलों पर धूल जमी हुई है।
भारत सरकार की तरफ से 2016 में जो आंकड़े दिये गये थे उनके अनुसार देश के 24 उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मामले लम्बित पड़े हैं। अब 2017 वर्ष भी समाप्त होने के करीब है तो मुकदमों की संख्या चार करोड़ के आसपास पहुंच जाएगी। इतने लोग न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। इनमें से कई तो बिना न्याय पाये ही स्वर्ग सिधार जाते हैंं। सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 10 लाख लोगों में सिर्फ 15 न्यायाधीश हैं जबकि विधि आयोग ने करीब 30 साल पहले इस अनुपात को बढ़ाकर प्रति दस लाख लोगों पर 50 न्यायाधीश करने की सिफारिश की थी। इसीलिए सरकार ने न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए जस्टिस क्लाक की मदद ली है। जस्टिस क्लाक एक साफ्टवेयर है जिसे भारत सरकार के कानून मंत्रालय ने तैयार करवाया है। यह देश भर के जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालय तक आंतरिक रूप से जुड़ा साफ्टवेयर होगा जिसमें सभी अदालतें एक-दूसरे से जुड़ी होंगी। भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि वे जिला कोर्ट और अपने हाईकोर्ट का सारा डाटा साफ्टवेयर को उपलब्ध करा दें। किस अदालत में कितने मुकदमे लंबित हैं और कितने समय से लंबित हैं किस मुकदमे में कितना समय लगा, मुकदमे के फैसले में देरी हुई तो क्यों हुई इस तरह की सभी जानकारियां जस्टिस क्लाक में मौजूद होंगी। इन जानकारियों की निगरानी केन्द्रीय कानून मंत्रालय करेगा। इस प्रकार न्यायाधीशों की कार्य पद्धति को परखने का मौका मिलेगा। कानून मंत्रालय सारे डाटा को देखकर कोर्ट और जज की रैकिंग तय करेगा। जिस कोर्ट ने मामले निपटाने में देर की है उस कोर्ट और वहां के जज की रैकिंग कम हो जाएगी। इसके विपरीत जो कोर्ट मुकदमों को अधिक संख्या में निपटाएगा उसकी रैकिंग अच्छी की जाएगी। इस प्रकार एक स्वस्थ परम्परा प्रतियोगिता की होगी। सामान्य रूप से यह माना जा रहा है कि इस सिस्टम में सभी कोर्ट एक-दूसरे से जुड़ जाएंगे और लम्बित मामलों को निपटाने में तेजी आएगी।
ऐसा नहीं कि इससे सिर्फ अदालतों का ही दायित्व बढ़ेगा बल्कि सरकार भी हमेशा कठघरे में रहेगी। सरकार का विधि विभाग जब यह कहता है कि प्रति10 लाख लोगों पर 50 न्यायाधीश होने चाहिए जबकि अभी सिर्फ 15 या मौजूदा आंकड़ों का अनुमान करके २० जज होंगे तो इतनी कम संख्या में जजों के रहते मुकदमों का निस्तारण कैसे किया जा सकता है? इसलिए सबसे पहले तो न्यायालयों में जजों के रिक्त पद भरने होंगे और देश में जिस तरह आबादी बढ़ रही है तो वाद-विवाद भी बढ़ते हैं और बढ़ते हुए मुकदमों के अनुपात में जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। एक बात और है। देश के विभिन्न हिस्सों में अपराध की स्थिति भी भिन्न है। जिन राज्यों में ज्यादा अपराध हो रहे हैं वहां न्यायालय और जजों की संख्या भी बढ़ानी पड़ेगी। न्यायालयों ने स्वयं भी जन अदालतें ज्यादा से ज्यादा लगाने की बात कही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी 26 नवम्बर को मन की बात कार्यक्रम में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का जिक्र किया था और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी इस मामले को उठा चुके हैं। इसलिए जस्टिस क्लाक बनाने के साथ सरकार को भी इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के वृंदावन में बांके बिहारी के दर्शन करने गये थे। वहां उनसे पत्रकारों ने इस संदर्भ में सवाल पूछा था। श्री प्रसाद ने बताया था कि उच्च न्यायालयों में कुल ९०६ पद हैं जबकि 263 खाली हैं। इसी प्रकार निचली अदालतों में करीब 4000 पद रिक्त हैं। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों को शीघ्र ही खाली पदों पर जजों की नियुक्ति करने को कहा गया है। भाजपा की केन्द्र के साथ ही १८ राज्यों में भी सरकार है। इसलिए अपने राज्यों में जजों की नियुक्ति करके भाजपा को पहल करनी चाहिए। अदालतों में ढांचागत संसाधन भी कम हैं। यह बात केन्द्रीय विधि मंत्री ने भी स्वीकार की थी और कहा था कि अदालतों में ढांचागत संसाधन बढ़ाने के साथ उनका तेजी से कम्प्यूटरीकरण भी कराया जा रहा है।
इस प्रकार सरकार पहले अपने दायित्व पूरा करे तब अदालतों की तरफ वह अंगुली उठा सकती है। सरकार की तरफ से भी अप्रत्यक्ष रूप से ढिलाई हो सकती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों सांसदों और विधायकोंं के खिलाफ दर्ज 1581 मामलों का विवरण मांगा था। यह विवरण निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक क्यों नहीं पहुंचा? इसके पीछे क्या कोई राजनीतिक दबाव काम कर रहा है? इस तरह के सवाल भी उठते हैं। विलंबित मामलों में ये मामले भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल पहली नवम्बर को केन्द्र सरकार को निर्देश दिया था कि1581 सांसदों ओर विधायकों से सम्बन्धित मामलों का विवरण पेश किया जाए जिन्होंने 2014 के आम चुनावों के समय नामांकन पत्र दाखिल करते समय अपने हलफनामे में इसकी जानकारी दी थी। इसका मतलब यह कि ये मामले 2014 से पहले के हैं। शीर्ष अदालत ने सरकार से पूछा था कि इन मामलों में कितने का निस्तारण एक वर्ष में किया गया और कितने आरोपियों को निर्दोष या दोषी ठहराया गया। इस तरह के मामले भी क्यों लटके रहते हैं। अभी हाल में मध्य प्रदेश की एक विधायक को लेकर फैसला सुनाया गया। उनके विधानसभा चुनाव को शून्य घोषित किया गया। यह मामला २००८ के विधानसभा चुनाव का था इस बीच विधायक ने कितनी सुविधाएं जन प्रतिनिधि होने के नाते प्राप्त कीं, इस पर भी गौर किया जाना चाहिए।
न्याय में विलम्ब के ये कुछ ऐेेसे उदाहरण हैं जो चीख-‘चीख कर कहते हैं कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता है। इसलिए सरकार और अदालतें दोनों इस पर गंभीरता से विचार करें और अदालतों में जो मुकदमों की फाइलें धूल खा रही हैं, उनको झाड़-फूंककर न्यायाधीश के सामने लाया जाए। (हिफी)

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