पुण्यतिथि 6 नवंबर पर विशेष

फ़िरदौस ख़ान-मुम्बई मायानगरी हैख़्वाबों का शहर है। एक ज़माने से देश के कोने-कोने से युवा हिन्दी सिनेमा में छा जाने का ख़्वाब लिए मुम्बई आते रहे हैं। इनमें से कई खु़शक़िस्मत तो सिनेमा के आसमान पर रौशन सितारा बनकर चमकने लगते हैंतो कई नाकामी के अंधेरे में खो जाते हैं। लेकिन युवाओं के मुम्बई आने का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है। एक ऐसे ही युवा थे संजीव कुमारजो फ़िल्मों में नायक बनने का ख़्वाब देखा करते थे। और इसी ख़्वाब को पूरा करने के लिए वह चल पड़े एक ऐसी राह परजहां उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना था। मगर अपने ख़्वाब को पूरा करने के लिए वह मुश्किल से मुश्किल इम्तिहान देने को तैयार थे। उनकी इसी लगन और मेहनत ने उन्हें हिन्दी सिनेमा का ऐसा अभिनेता बना दियाजो ख़ुद ही अपनी मिसाल है। संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई, 1938 को मुम्बई में हुआ था। उनका असली नाम हरि भाई ज़रीवाला था। उनका पैतृक निवास सूरत में था। बाद में उनका परिवार मुम्बई आ गया। उन्हें बचपन से फ़िल्मों का काफ़ी शौक़ था। वह फ़िल्मों में नायक बनना चाहते थे। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने रंगमंच का सहारा लिया। इसके बाद उन्होंने फ़िल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाख़िला ले लिया और यहां उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। उनकी क़िस्मत अच्छी थी कि उन्हें 1960 में फ़िल्मालय बैनर की फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी में काम करने क मौक़ा मिल गया। फ़िल्म में उनका किरदार तो छोटा-सा थावह भी सिर्फ़ दो मिनट कालेकिन इसने उन्हें अभिनेता बनने की राह दे दी।

 1965 में बनी फ़िल्म निशान में उन्हें बतौर मुख्य अभिनेता काम करने का सुनहरा मौक़ा मिला। यह उनकी ख़ासियत थी कि उन्होंने कभी किसी भूमिका को छोटा नहीं समझा। उन्हें जो किरदार मिलताउसे वह ख़ुशी से क़ुबूल कर लेते। 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म शिकार में उन्हें पुलिस अफ़सर की भूमिका मिली। इस फ़िल्म में मुख्य अभिनेता धर्मेंद्र थेलेकिन संजीव कुमार ने शानदार अभिनय से आलोचकों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा। इस फ़िल्म के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला। 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म संघर्ष में छोटी भूमिका होने के बावजूद वह छा गए। इस फ़िल्म में उनके सामने महान अभिनेता दिलीप कुमार भी थेजो उनकी अभिनय प्रतिभा के क़ायल हो गए थे। उन्होंने फ़िल आशीर्वादराजा और रंक और अनोखी रात जैसी फ़िल्मों में अपने दमदार अभिनय की छाप छोड़ी। 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म खिलौना भी बेहद कामयाब रही। इस फ़िल्म ने संजीव कुमार को बतौर अभिनेता स्थापित कर दिया। इसी साल प्रदर्शित फ़िल्म दस्तक में सशक्त अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़े गए। फिर 1972 में प्रदर्शित फ़िल्म कोशिश में उन्होंने गूंगे बहरे का किरदार निभाकर यह साबित कर दिया कि वह किसी भी तरह की भूमिका में जान डाल सकते हैं। इस फ़िल्म को संजीव कुमार की महत्वपूर्ण फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। फ़िल्म शोले में ठाकुर के चरित्र को उन्होंने अमर बना दिया।

 उन्होंने 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म नया दिन नई रात में नौ किरदार निभाए। इसमें उन्होंने विकलांगनेत्रहीनबूढ़ेबीमारकोढ़ीहिजड़ेडाकूजवान और प्रोफ़ेसर का किरदार निभाकर अभिनय और विविधता के नये आयाम पेश किए। उन्होंने फ़िल्म आंधी में होटल कारोबारी का किरदार निभायाजिसकी पत्नी राजनीति के लिए पति का घर छोड़कर अपने पिता के पास चली जाती है। इसमें उनकी पत्नी की भूमिका सुचित्रा सेन ने निभाई थी। इस फ़िल्म के लिए संजीव कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अगले ही साल 1977 में उन्हें फ़िल्म अर्जुन पंडित के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।

 उनकी अन्य फ़िल्मों में पति पत्नीस्मगलरबादलहुस्न और इश्क़साथीसंघर्षगौरीसत्यकामसच्चाईज्योतिजीने की राहइंसाफ़ का मंदिरग़ुस्ताख़ी माफ़धरती कहे पुकार केचंदा और बिजलीबंधनप्रियामां का आंचलइंसान और शैतानगुनाह और क़ानूनदेवीदस्तकबचपनपारसमन मंदिरकंगनएक पहेलीअनुभवसुबह और शामसीता और गीतासबसे बड़ा सुखरिवाजपरिचयसूरज और   चंदामनचलीदूर नहीं मंज़िलअनामिकाअग्नि रेखाअनहोनीशानदारईमानदावतचौकीदारअर्चनामनोरंजनहवलदार,   आपकी क़समकुंआरा बापउलझनआनंदधोती लोटा और चौपाटीअपने रंग हज़ारअपने दुश्मनआक्रमणफ़रारमौसमदो लड़कियांज़िंदगीविश्वासघातपापीदिल और पत्थरधूप छांवअपनापनअंगारेआलापईमान धर्मयही है ज़िंदगीशतरंज के खिलाड़ीमुक्तितुम्हारे लिएतृष्णा डॉक्टरस्वर्ग नर्कसावन के गीतपति पत्नी और वोमुक़द्दरदेवतात्रिशूलमान अपमानजानी दुश्मनघर की लाजबॉम्बे एट नाइटहमारे तुम्हारेगृह प्रवेशकाला पत्थरटक्करस्वयंवरपत्थर से टक्करबेरहमअब्दुल्लाज्योति बने जवालाहम पांच कृष्णसिलसिलावक़्त की दीवारलेडीज़ टेलरचेहरे पे चेहराबीवी ओ बीवीइतनी सी बातदासीविधातासिंदूर बने ज्वालाश्रीमान श्रीमतीनमकीनलोग क्या कहेंगेखु़द्दारअय्याशहथकड़ीसुराग़सवालअंगूरहीरो और यादगार शामिल हैं।

उन्होंने पंजाबी फ़िल्म फ़ौजी चाचा में भी काम किया। कई फ़िल्में उनकी मौत के बाद प्रदर्शित हुईंजिनमें बद और बदनामपाखंडीमेरा दोस्त मेरा दुश्मनलाखों की बातज़बरदस्तराम तेरे कितने नामबात बन जाएहाथों की लकीरेंलव एंड गॉडकांच की दीवरक़त्लप्रोफ़ेसर की पड़ौसन और राही शामिल हैं। संजीव कुमार के दौर में हिन्दी सिनेमा में दिलीप कुमारधर्मेंद्रराजेश खन्नाअमिताभ बच्चन और शम्मी कपूर जैसे अभिनेताओं का बोलबाला था। इन अभिनेताओं के बीच संजीव कुमार ने अपनी अलग पहचान क़ायम की। उन्होंने अभिनेता और सहायक अभिनेता के तौर पर कई यादगार भूमिकाएं कीं।

 वह आजीवन अविवाहित रहे। कई अभिनेत्रियों के साथ उनके प्रसंग सुर्ख़ियों में रहे। कहा जाता है कि पहले उनका रुझान सुलक्षणा पंडित की तरफ़ हुआलेकिन प्यार परवान नहीं चढ़ पाया। इसके बाद उन्होंने हेमा मालिनी से विवाह करना चाहालेकिन वह अभिनेता धर्मेंद्र को पसंद करती थींइसलिए यहां भी बात नहीं बन पाई। हेमा मालिनी ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर पहले से शादीशुदा धर्मेंद्र से शादी कर ली। धर्मेंद्र ने भी इस विवाह के लिए इस्लाम क़ुबूल किया था। यह कहना ग़लत न होगा कि ज़िन्दगी में प्यार क़िस्मत से ही मिलता है। अपना अकेलापन दूर करने के लिए संजीव कुमार ने अपने भतीजे को गोद ले लिया। संजीव कुमार के परिवार में कहा जाता था कि उनके परिवार में बड़े बेटे के दस साल का होने पर पिता की मौत हो जाती हैक्योंकि उनके दादापिता और भाई के साथ ऐसा हो चुका था। उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जैसे ही उनका भतीजा दस साल का हुआ 6 नवंबर1985 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था या कुछ और। ज़िन्दगी के कुछ रहस्य ऐसे होते हैंजो कभी सामने नहीं आ पाते। बहरहालअपने अभिनय के ज़रिये संजीव कुमार खु़द को अमर कर गए। जब भी हिन्दी सिनेमा और दमदार अभिनय की बात छिड़ेगीउनका नाम ज़रूर लिया जाएगा। ऐसे थे हरीभाई ज़रीवाला यानी हमारे संजीव कुमार। (लेखिका शायरा, कहानीकार व पत्रकार हैं)

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