कांग्रेस जब हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनाव लडऩे के लिए मैदान में उतरने को है, तभी पंजाब के गुरदासपुर में संसद की एक सीट के उपचुनाव में उसके प्रत्याशी को शानदार सफलता मिली है। यह विजय कांग्रेस के मनोबल को जहां एक तरफ बढ़ाती है, वहीं यह भी साबित होता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने कैप्टन अमरिन्दर सिंह को मुख्यमंत्री बनाकर कोई गलती नहीं की है। कांग्रेस के लिए यह शुभ शकुन भी है क्योंकि जिन दो राज्यों में उसे चुनाव का मुकाबला करना है, वहां उसके सामने मुख्य प्रतिद्वन्द्वी के रूप में भाजपा है। भाजपा ने 2014 में जब से संसद के आम चुनावों में प्रचण्ड बहुमत हासिल किया है, उसके बाद उसके विजय रथ को सिर्फ गैर कांग्रेसी दलों ने ही रोका है। कांग्रेस उन चुनावों से लगभग होशोहवास ही खो बैठी है क्योंकि गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी रहते हुए कांग्रेस गठबंधन करके सरकार नहीं बना पायी, जबकि भाजपा ने जोड़-तोड़ करके सरकार बना ली। अब हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है लेकिन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का पूरा परिवार भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा हुआ है और कांग्रेस के पास वीरभद्र से बेहतर कोई नेता भी नहीं दिखा, इसीलिए वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में ही फिर से कांग्रेस चुनाव लड़ रही है। गुजरात में तो भाजपा की लगातार तीन टर्म से सरकार चल रही है और कांग्रेस के पास वहां वीरभद्र जैसा नेता भी नहीं है। इसलिए दोनों राज्यों में कांग्रेस के लिए मैदान असमंजस भरा है। ऐसे में कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने पंजाब की एक संसदीय सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाकर दीपावली ने खुशी से मनाने का मौका तो दे ही दिया है।
पंजाब की गुरदासपुर संसदीय सीट पूर्व अभिनेता और भाजपा नेता विनोद खन्ना के निधन से रिक्त हुई थी। इसी साल 27 अप्रैल को विनाद खन्ना का बीमारी के चलते निधन हो गया था। उन्हें एडवांस्ड ब्लैडर कार्सिनोमा था और बीमारी के चलते ही मुंबई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में उनका निधन हो गया। श्री विनोद खन्ना ने 1968 में सुनील दत्त की फिल्म मन का मीत से फिल्मी करियर शुरू किया था। इसके बाद मेरे अपने, दयावान, कुर्बानी, मेरा गांव मेरा देश, मुकद्दर का सिकन्दर, अमर अकबर एन्थोनी जैसी 140 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। इसी दौरान वे आध्यात्मिक गुरु रजनीश के शिष्य हो गये और उनका फिल्मी जीवन काफी पीछे चला गया। उनका रुझान राजनीति की तरफ गया और 1997 में विनोद खन्ना ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। पंजाब की गुरदासपुर सीट से ही वे चार बार सांसद रहे। उन्होंने1998, 1999, 2004 और 2014 का लोकसभा चुनाव जीता लेकिन 2009 में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में वे पर्यटन और संस्कृति मंत्री बनाये गये थे। उन्हें विदेश राज्यमंत्री की भी जिम्मेदारी दी गयी थी।
इस प्रकार गुरदासपुर संसदीय सीट भाजपा की पुख्ता गढ़ मानी जा रही थी। इसलिए इस सीट पर कांग्रेस की जीत का विशेष महत्व माना जा रहा है। कांग्रेस ने यहां से अपने प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ को प्रत्याशी बनाया था। उनसे मुकाबला करने के लिए भाजपा-अकाली गठबंधन ने साझा प्रत्याशी उतारा। भाजपा ने स्वर्ण सलारिया को खड़ा किया था। पंजाब में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान ही अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी यहां तीसरा मोर्चा बनकर उभरी है और इस उपचुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने प्रत्याशी उतारा था। अरविन्द केजरीवाल को जरूर निराशा हाथ लगी होगी क्योंकि विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल होते हुए भी उनकी पार्टी के प्रत्याशी मेजर जनरल सुरेश कथूरिया सिर्फ 23 हजार पांच सौ 79 वोट ही प्राप्त कर सके। भाजपा-अकाली गठबंधन के प्रत्याशी स्वर्ण सलारिया ने कांग्रेस प्रत्याशी सुनील जाखड़ को कड़ी टक्कर दी है। सुनील जाखड़ को चार लाख 99  हजार सात सौ 52  मत हासिल हुए हैं  और उन्होंने स्वर्ण सलारिया को लगभग दो लाख वोटों से पराजित किया है। स्वर्ण सलारिया को तीन लाख 6 हजार 53 मत मिले हैं।
चुनाव पर पैनी नजर रखने वालों का मानना है कि कांग्रेस की जीत के कुछ प्रमुख कारण रहे हैं। इनमें सबसे पहला कारण कांग्रेस और भाजपा अकाली गठबंधन के प्रत्याशियों का जनता के बीच आकलन था। कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ को मैदान में उतारा, जिनके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा है। भाजपा ने उन्हें बाहरी क्षेत्र का प्रत्याशी बताकर जनता में स्थानीय-बाहरी प्रत्याशी की विभेदकारी नीति का सहारा जरूर लिया लेकिन इसमें उसे सफलता नहीं मिली। सबसे बड़ी बात यह थी कि स्वर्ण सलारिया की छवि अच्छी नहीं थी। उन पर दुराचार का आरोप लगा था। इससे उनकी जीत की संभावनाएं कम हो गयी थीं। अकाली दल की बदनामी तो राज्य में नशीली दवाओं के धंधे के बाद से ही चल रही थी। शिरोमणि अकाली दल के नेता सुच्चा सिंह पर भी दुराचार का आरोप लगाया गया। इस प्रकार भाजपा-अकाली दल के प्रत्याशी और पार्टियों-दोनों का नकारात्मक प्रभाव मतदाताओं पर पड़ा।
हालांकि कुछ राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि जीएसटी और किसानों को लेकर भी मोदी सरकार से लोगों में नाराजगी है। यमुना-सतलुज लिंक नहर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सांसद पद से इस्तीफा दिया था। हालांकि इस इस्तीफे के पीछे एक राजनीति थी और उसे सब जानते भी थे कि पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद कैप्टन अमरिंदर मुख्यमंत्री बनेंगे तो उन्हें संसद की सीट तो छोडऩी ही होगी। यह काम उन्होंने थोड़ा पहले कर दिया और पंजाब के किसानों की सहानुभूति भी उनको मिली। कांग्रेस के लिए तो यह जीत संजीवनी से कम नहीं थी। कांग्रेस जब हर तरफ से जहाज डूब रहा था, संसदीय चुनाव के बाद एक-एक करके उसके राज्यों पर भाजपा कब्जा करती जा रही थी, तब कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने ही पंजाब में राज्य की 117  विधानसभा सीटों में कांग्रेस को 77 विधायक दिये थे। पंजाब की जनता अभी कैप्टन अमरिन्दर सिंह पर ही भरोसा कर रही है। किसानों की कर्जमाफी का फैसला करके और नशे का व्यापार करने वालों पर शिकंजा कसकर कैप्टन ने उन वादों को भी पूरा किया जो विधनसभा चुनावों के दौरान किये थे। उनकी सात महीने पुरानी सरकार के खिलाफ जनता में नाराजगी नहीं है, जिसे भाजपा और अकाली दल भुना पाते। आश्चर्य की बात यह भी रही कि क्षेत्र में सिर्फ ५६ फीसद लोगों ने मत डाला। भाजपा को लेकर यह कहा जाता है कि उसके बूथ स्तर के कार्यकर्ता बहुत पहले से मतदान की तैयारी में लग जाते हैं और मतदाताओं को पोलिंग स्टेशन तक खींच ही लाते हैं। मतदान का प्रतिशत कम रहने से यह भी कहा जाता है कि भाजपा ने इस उपचुनाव की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया जितना गुजरात और हिमाचल प्रदेश में दे रही है। इस उपचुनाव में भाजपा और अकाली दल की तुलना में कांग्रेस ज्यादा एकजुट नजर आयी। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू, वित्तमंत्री मनप्रीत बादल और सुनील जाखड़ ने जमकर प्रचार किया जबकि पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल खराब स्वास्थ्य के चलते प्रचार ही नहीं कर पाये।
बहरहाल कारण कुछ भी रहे हों लेकिन गुरदासपुर की जीत कांग्रेस के लिए बेहद खुशी की बात है और साथ ही इस बात की शिक्षा भी देती है कि विपक्षी प्रत्याशी के मुकाबले में कैसा प्रत्याशी उतारा जाए और पार्टी संगठित व एकजुट नजर आये। यह सीख कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में मुफीद साबित हो सकती है। (हिफी)

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