मजरूह सुल्तानपुरी
पुण्य तिथि पर विशेष-मजरूह सुल्तानपुरी हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। इनका पूरा नाम असरार उल हसन…
भीड़ से जुदा
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रमजान माह में होने वाले आयोजनो हेतु सभी प्रशासनिक तैयारियां ससमय पूरी करें- पुलिस, यातायात, अग्निशमन सेवाएं चुस्त-दुरूस्त रखी जाये-…
स्वप्निल संसार लखनऊ । पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने महिला सशक्तिकरण को अपूर्व एवं अविस्मरणीय योगदान दिया था। उनकी नई…
पहाड़ों की रानी’ बछेंद्री पाल विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला हैं। बछेंद्री…
भाजपा सरकार में एक बार फिर आजमगढ़ को बदनाम करने की साजिश- रिहाई मंच मोदी की रैली के बहाने ध्रुवीकरण…
तारा सुतारिया को मिले शाहिद करण जौहर की आगामी फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर-2 की घोषणा हो चुकी है। इस…
Agency.Gayatri Devi (born as Princess Gayatri Devi of Cooch Behar; was the third Maharani consort of Jaipur from 1940 to…
संजोग वॉल्टर। अदीब वॉल्टर। स्वप्निल संसार। लखनऊ में जेठ महीने में पड़ने वाले सभी मंगल ‘बडा़ मंगल’ के रूप में मनाए…
मध्य प्रदेश में साइकिल की जोरदार दस्तक-राजेन्द्र चौधरी , राष्ट्रीय सचिव, समाजवादी पार्टी लखनऊ। स्वप्निल संसार। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष…
वायु प्रदूषण के कारण उत्तर प्रदेश के सात शहरों में समयपूर्व मृत्यु दर में बढ़ोतरी सीड और आइआइटी–दिल्ली की रिपोर्ट के अनुसार यूपी में वायु प्रदूषण में खतरनाक वृद्धि लखनऊ। स्वप्निल संसार। पिछले दो दशकों में खराब एयर क्वालिटी ही वह प्रधान कारण है, जिस वजह से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के शहरी इलाकों में मृत्यु दर में बढ़ोतरी हुई है। यह निष्कर्ष है, सेंटर फॉर एन्वॉयरोंमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) और आइआइटी–दिल्ली द्वारा तैयार एक रिसर्च रिपोर्ट ‘नो व्हाट यू ब्रीथ’1(जानिए आप कैसी हवा में सांस ले रहे हैं) का, जिसके अनुसार बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण गंगा के मैदानी इलाकों में स्थित उत्तर भारत के शहरों में ‘समयपूर्व मृत्यु–दर (प्रीमैच्योर मोर्टेलिटी)’ चिंताजनक ढंग से प्रति लाख आबादी पर 150-300 व्यक्ति के करीब पहुंच गयी है। यह भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि अध्ययनमें शामिल 11 शहरों में (रांची को छोड़कर) सभी जगह एक प्रदूषक तत्व– पर्टिकुलेट मैटर (पीएम2.5) का स्तर नेशनल स्टैंडर्ड से दो गुना ज्यादा2 और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सालाना स्वीकारयोग्य सीमा3 से आठ गुना ज्यादा हो गया है। इन ग्यारह शहरों में उत्तर प्रदेश के आगरा, इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, वाराणसी, गोरखपुर, बिहार राज्य के पटना, गया व मुजफ्फरपुर और झारखंड प्रदेश के रांची को शामिल किया गया। यह रिपोर्ट सालाना मध्यमान पर्टिकुलेट मैटर (पीएम2.5) के संकेंद्रण की पड़ताल करता है, जिसे पिछले 17 सालों के सैटेलाइट डाटा के गहन विश्लेषण से तैयार किया गया है।इस रिपोर्ट में शामिल वायु प्रदूषण से त्रस्त 8 शहरों को पहले ही वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के द्वारा तैयार ग्लोबल एयर क्वालिटी एसेसमेंट पर आधारितरिपोर्ट ‘ग्लोबल एंबियंट एयर क्वालिटी डाटाबेस (2018)4 में स्थान मिल चुका है। उत्तर प्रदेश से संबंधित मुख्य निष्कर्षों में ये तथ्य उभर कर सामने आये हैं कि गंगा के मैदानी प्रदेश के पश्चिमी छोर पर बसे मेरठ (99.2μg/m3) और आगरा (91μg/m3) जैसे शहरों में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण की समस्या है। यह रिपोर्ट इस तथ्य पर जोर देती है कि इंडो गंगेटिक एरिया में पीएम2.5 एक्सपोजर संबंधी उत्सर्जनउभार पश्चिम से पूर्वी इलाकों की ओर जा रहा है। अध्ययन में शामिल 11 शहरों में वाराणसी में पीएम2.5 का विस्तार सबसे तेज पाया गया है। पिछले 17 वर्षों में वाराणसी में पीएम2.5 के स्तर ने 28.5μg/m3 तक बढ़ने का संकेत दिया है। प्रदेश के प्रमुख शहरों में गिने जानेवाले मेरठ, आगरा, लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर मेंपीएम2.5 की बढ़ती रफ्तार ‘‘अलार्मिंग’’ स्तर पर आ चुकी है, वहीं कानपुर और इलाहाबाद में यह ‘‘मोडरेट’’ स्तर पर है। बढ़ते प्रदूषण के कारण सालाना समयपूर्व मृत्युदर के मानक पर कानपुर में सर्वाधिक मौत यानी 4173 प्रति वर्ष होती है, वहीं इसके बाद लखनऊ में 4127 लोगों की मृत्यु हो जाती है। अगर सालानासमयपूर्व मृत्युदर की संख्या को प्रत्येक लाख की आबादी के मानक में परिवर्तित करें तो मेरठ और आगरा में सर्वाधिक यानी प्रतिलाख 290 लोगों की मृत्यु होती है। मेरठ में वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। मौसम संबंधी प्रदूषण में उतार–चढ़ाव की बात करें तो यह बात महत्वपूर्ण है कि अक्तूबर सेनवंबर के मानसून पश्चात सीजन और दिसंबर–फरवरी के जाड़े के सीजन में निम्न सीमा परत और सापेक्ष रूप से ठंडी स्थिति के कारण पीएम2.5 के मामले में बहुत ज्यादा एक्सपोजर लेवल रहा करता है। रिपोर्ट के मुख्य नतीजों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए सीड के प्रोग्राम डायरेक्टर श्री अभिषेक प्रताप ने कहा कि ‘हम लोग अपने शहरों में जन स्वास्थ्य के दुःस्वप्न का सामना कर रहे हैं, क्योंकि प्रदूषित हवा फेफड़े खराब कर हमारा दम घोंट रही है। यह हमारे लिए जागने का समय है और पॉल्युशन ट्रेंड को पलटने के लिएसक्रिय होने का भी, क्योंकि हमारा स्वास्थ्य और जीवन दावं पर लगा हुआ है। केंद्र व राज्य सरकारों को इस अलार्मिंग स्थिति को अविलंब नोटिस में लेना चाहिए और समाधान के तौर पर एक नेशनल क्लीन एयर एक्शन प्लान तैयार करना चाहिए, जो महत्वाकांक्षी व प्रभावी हो और समय आधारित क्रियान्वयन पर फोकसकरता हो।’ श्री प्रताप ने आगे बताया कि ‘वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने का कोई भी बेहतर प्रयास एक समुचित एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग मैकेनिज्म के बिना व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि बिना समुचित डाटा के यह स्थिति अंधेरे में तीर मारने के जैसी है और अंततः हमें औंधे मुंह गिरना पड़ेगा।’ यह रिपोर्ट इस तथ्य पर जोर देती है कि इंडो गंगेटिक एरिया में पीएम2.5 एक्सपोजर संबंधी उत्सर्जन उभार पश्चिम से पूर्वी इलाकों की ओर जा रहा है। अध्ययन में शामिल 11 शहरों में वाराणसी में पीएम2.5 का विस्तार सबसे तेज और रांची में सबसे कम पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले 17 वर्षों में वाराणसी में पीएम2.5 केस्तर ने 28.5 μg/m3 तक बढ़ने का संकेत दिया है। वाराणसी के अलावा मेरठ, आगरा, लखनऊ, गोरखपुर और पटना में पीएम2.5 की बढ़ती रफ्तार ‘‘अलार्मिंग’’ स्तर पर आ चुकी है, वहीं कानपुर, इलाहाबाद और गया में यह ‘‘मोडरेट’’ है। मुजफ्फरपुर में प्रदूषक धूलकणों में वृद्धि की दर कमोबेश रांची से तुलनायोग्य है।मौसम संबंधी प्रदूषण में उतार–चढ़ाव की बात करें तो यह बात महत्वपूर्ण है कि अक्तूबर से नवंबर के मानसून पश्चात सीजन और दिसंबर–फरवरी के जाड़े के सीजन में निम्न सीमा परत और सापेक्ष रूप से ठंडी स्थिति के कारण बहुत ज्यादा एक्सपोजर लेवल रहा करता है। रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों के बारे में जानकारी देते हुए सीड की सीनियर प्रोग्राम ऑफिसर अंकिता ज्योति ने बताया कि ‘एयरोसोल कंपोजिशन के विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया है कि एयरोसोल पॉल्युटेंट्स जैसे सल्फेट, ऑर्गेनिक कार्बन, ब्लैक कार्बन जैसे प्रमुख प्रदूषकों का प्रतिशत बढ़ता गया है। प्रदूषण स्तर में ऐसीखतरनाक वृद्धि के लिए मुख्य रूप से मानवजनित स्रोत जिम्मेवार हैं और इसमें सबसे अहम भूमिका अनियोजित और बेतहाशा बढ़ते शहरीकरण की है। इसके अलावा मौसमविज्ञान संबंधी और स्थान–परिवेश की प्रकृति प्रदूषण के स्तर को परिवर्तित करने में प्रमुख भूमिका निभाती है।’ उन्होंने बताया कि ‘पीएम2.5संकेद्रण में सबसे बड़ा योगदान आवासीय स्रोतों जैसे कुकिंग, हीटिंग और लाइटिंग का है, इसके बाद इन शहरों में इंडस्ट्री, ट्रांसपोर्ट और एनर्जी सेक्टर का…