*डॉ. के.परमेश्वरन। पाक जलडमरू पर बना पमबन पुल एक छोटे से बीम पर बना पुल है, जो पवित्र और धार्मिक शहर रामेश्वरम को भारत के मुख्य भू-भाग से जोड़ता है। मुख्य भू-भाग और द्वीप के बीच इकलौता सड़क परिवहन संपर्क, यह पुल दो किलोमीटर तक फैला हुआ है। बाहुधरन का उपयोग कर इस पुल को बनाया गया है। इसमें ढांचा क्षितिज के समानांतर दिशा में खड़ा होता है और केवल एक छोर पर इसे सहारा दिया जाता है। पहली बार लोहे से बना यह बाहुधरन पुल, इंजीनियरिंग की महत्वपूर्ण खोज है। इसका फैलाव 1,500 (460 मी.) फीट से अधिक है और मुश्किलभरे रास्तों पर भी इनका निर्माण आसानी से किया जा सकता है। 6,776 फीट लम्बे पमबन पुल को 1914 में यातायात के लिए खोला गया था। पुल के बीच में एक दोहरा पत्तीनुमा भाग है, जिसे उठाने से जहाज और माल वाहक नौकाएं गुजर सकती हैं। इस रेलवे पुल पर ऐतिहासिक रूप से मीटर गेज की रेलगाडिय़ां चलाई गईं, लेकिन अगस्त, 2007 में इस पुल को ब्रॉडगेज की रेलगाडिय़ों के परिचालन के लिए और उन्नत बनाया गया। अभी तक पुल की दो पत्तियों को लीवर का उपयोग कर मजदूरों द्वारा हाथ से खोला जाता था। मालवाहक जहाज, समुद्री रक्षा जहाज, मछली पकडऩे की नौकाएं और तेल के टैंकर सहित करीब 10 जहाज प्रति माह इस पुल से गुजरते हैं। दो लाइन के इस उठे हुए सड़क पुल से लगते हुए द्वीप और साथ ही नीचे बने रेल पुल को देखा जा सकता है। सौ वर्ष पहले निर्मित यह पुल अभी भी बढिया स्थिति में है तथा इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण है। हजारों हिन्दू श्रद्धालु प्रति वर्ष इस पुल को पार कर पवित्र हिन्दू स्थल रामेश्वरम की यात्रा करते हैं। विभिन्न विशेषज्ञों के अनुसार यह पुल दुनिया के दूसरे सबसे अधिक क्षयकारी वातावरण में स्थित है। इस तरह के वातावरण में पहला पुल अमरीका के मियामी में बनाया गया है, जिसका निर्माण एक चुनौती भरा कार्य था। पमबन पुल उच्च तीव्रता वाले भूकंप संभावित क्षेत्र में स्थित है।

1965 की घटना
1965 में सिविल इंजीनियरी के निदेशक (बाद में वे रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए) जी.पी. वारियर ने अपनी आत्मकथा जिसका शीर्षक ‘टाइम, टाइड एण्ड माई रेलवे डेज़ में पमबन पुल के बारे में लिखा। ”फरवरी 1965 में रात्रि दस बजे रामेश्वरम और धनुषकोटी के बीच एक यात्री रेलगाड़ी को 14 फीट ऊंची अभूतपूर्व ज्वारीय धारा अपने साथ बहा ले गई। इस दुर्घटना में कोई भी जिंदा नहीं बचा। ज्वारीय धारा के कारण पमबन पुल का उपयोग बंद होने से मुख्य भू-भाग और रामेश्वरम द्वीप के बीच के सभी संपर्क कट गए। इस लम्बे रेलवे पुल के सभी 144 लोहे के खम्भे बह गए।  मेधावी इंजीनियर, श्रीधरन जीर्णोद्धार कार्य के प्रभारी थे। चार महीने की अल्पाविधि में इस बहुत कठिन कार्य को पूर्ण करने का श्रेय उन्हें जाता है। 13 जनवरी, 2013 को एक मालवाहक जहाज के पमबन रेलवे पुल से टकराने के कारण सौ साल पुराने इस पुल को मामूली क्षति पहुंची। एक मालवाहक जहाज कोलकाता से मुंबई बंदरगाह के लिए चला, लेकिन 10 जनवरी को खराब मौसम के कारण यह जहाज अपने रास्ते से भटक गया तथा रेल पुल से 50 मीटर की दूरी पर यह अटक गया। 100 मीटर की दूरी पर बह रही मालवाहक नौका पमबन रेल पुल से टकरा गई।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से अनुरोध
रेलवे ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास से अनुरोध किया कि वे एक शतक पुराने पमबन पुल की मजबूती का अनुमान लगाएं और इसके विकल्पों का विश्लेषण करे। इस पर भी विचार करने को कहा गया है कि क्या मौजूदा ढांचे से लगता हुआ एक नया ढांचा तैयार किया जाना जरूरी था। नौसंचालन के लिए विभाजित फैलाव के साथ नये पुल का निर्माण, मौजूदा पुल को अधिक मजबूत बनाना या सड़क पुल की तरह ऊपर उठे ढांचे का निर्माण करने जैसे विकल्प शामिल हैं।
वीना धनाम्मल और पमबन पुल
पमबन पुल के साथ कर्नाटक संगीत की जानी-मानी गायिका वीना धनाम्मल की कहानी जुड़ी हुई है। जो छात्र ऊंचे टैम्पो में गाना गाते थे उन्हें वह डांटते हुए कहती थी कि क्या वे बोट ट्रेन पकडऩे जा रहे हैं या उससे आगे निकलना चाहते हैं। तत्कालीन प्रसिद्ध बोट ट्रेन (बोट मेल) 1915 से 1964 की अवधि में मद्रास इग्मोर से धनुषकोटी के बीच चलती थी। वहां से यात्री तलाईमन्नार, सिलोन जाते थे, जो अब श्रीलंका के नाम से जाना जाता है। हालांकि 1965 में ज्वारीय धारा की दुर्घटना में नष्ट होने के बाद से पमबन जंक्शन से धनुषकोटी के बीच मीटर गैज लाइन बंद कर दी गई थी।

(पसूका फीचर्स) * लेखक पसूका मदुरई में सहायक निदेशक हैं।

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