नरेन्द्र मोदी सरकार ने अभी हाल ही में  9491 गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों को बड़ी जोखिम वाली इकाइयों के रूप में  वर्गीकृत किया है। इसके साथ ही जनता को भी सावधान किया गया कि ऐसी कम्पनियों से सावधान रहें। ये कम्पनियां जनता को अधिक लाभ देने का दावा करती हैं और बाद में  रकम डकार कर फरार हो जाती हैं। जनता के पैसे के प्रति सुरक्षा के लिए सरकार तेजी से कसरत कर रही है, इसमें  कोई संदेह नहीं है लेकिन कुछ दिन पहले ही मुम्बई  की पंजाब नेशनल बैंक शाखा से नीरव मोदी ने 11400 करोड़ का कर्ज लिया और विदेश भाग गये। इसके दो दिन बाद ही रोटोमेक्स पेन के प्रमुख कारोबारी विक्रम कोठारी पर पांच हजार करोड़ रुपये हजम करने का आरोप लगा। इस प्रकार ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी और विक्रम कोठारी के कारनामों ने सरकार को तो परेशान किया ही है जनता के मन में  भी बेचैनी पैदा कर दी है। जनता का बैंकों पर से विश्वास डगमगाने लगा है। गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों में  भी बड़ी संख्या में  लोग लेन-देन करते हैं लेकिन सरकार के ही जब हाथ-पांव ढीले होने लगे हैं तो आम जनता को भरोसा कौन दिलाएगा? जनता अब इस सच्चाई को भी समझने लगी है कि सरकार अपने धन को देश के अंदर ही संभाल नहीं पा रही है लेकिन जनता के सामने यह दिखावा कर रही है कि विकास कार्य के लिए पैसे की कमी है।
नीरव मोदी के पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले ने तो सरकारी बैंकों, बैंकों का आॅडिट करने वाली संस्थाओं और बैंकों के कामकाज पर निगरानी रखने वाले रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया की क्षमता के साथ वित्तमंत्री अरुण जेटली की कार्य शैली पर भी सवालिया निशान लगाया है। टैक्स के रूप में  पैसा इकट्ठा करने में  जेटली साहेब जितने सक्रिय हैं, वित्तीय संस्थाओं के कामकाज पर निगरानी रखने में  उतने ही पीछे नजर आ रहे हैं। उनका अर्थ ज्ञान जनता की समझ में  नहीं आ रहा है क्योंकि गांव से लेकर शहरों तक लोग बैंक से कर्ज लेते है। गांव वालों से ज्यादा इस बात को कौन समझता होगा जो मामूली कर्ज के चलते अपने बैल और खेत तक नीलाम करवा चुके हैं। उन्हंे बैंक से कर्जा लेने में  कितने ही पापड़ बेलने पड़ते हैं लेकिन जब नीरव मोदी जैसे व्यापारी 11400 करोड़ रुपये लेकर भाग जाते हैं और उनके घर-प्रतिष्ठानों पर जब छापा मारा जाता है तो उल्टे चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर कहते हैं कि हमारी दुकानें क्यों सील करवा दीं, छापे क्यों डाले, इससे हमारी साख (प्रतिष्ठा) गिर गयी और अब हम एक पैसा भी नहीं देंगे।
बैंकों से कर्ज लेने के मामले में  हमने यूनियन बैंक आॅफ इण्डिया की गोरखपुर स्थित सूरज कुंड शाखा की प्रबन्धक दिव्या यादव जी से बात की। हमने उनसे यही सीधा सवाल किया कि बैंक किसी सामान्य आदमी को जरूरत के वक्त कर्ज देने में  लम्बे-चैड़े फार्म भरवाते हैं, जमानतदार भी मांगते हैं और किस्तों में पैसा देते हैं लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये बड़ी आसानी से केसे मिल जाते हैं? मेरा सवाल सुनकर पहले तो वे हंसने लगीं और कहा सच बताएं या बैंक रूलिंग से। मैंने कहा सच ही बता दो। इस पर उन्होंने बताया कि बैंक को अपने बड़े कस्टमर से अच्छी कमायी होती है और उन्हें नाराज नहीं किया जाता। इसलिए तमाम बातें गोपनीय रहती हैं। ज्यादा फार्मलिटी की जरूरत नहीं समझी जाती। कस्टमर बहुत सी सूचनाएं नहीं देना चाहते तो भी उन्हें ऋण दे दिया जाता है। उनकी एक साख भी होती है। अतीत में  उनका व्यवहार कैसा रहा, यह भी देखा जाता है। बैंक की भाषा में  इसे ड्यू डेलिजेंस कहते हैं। कभी-कभी समस्या खड़ी हो जाती है जैसी इन दिनों दिखाई पड़ी है। बैंक के नियमों के अनुसार कर्ज उससे कहीं कम दिया जाता है जितने की जमानत उससे ली जाती है। लगभग इसी प्रकार की जानकारी बैंक के कुछ अन्य अधिकारियों ने भी बतायी। उन्होंने अपना नाम देने से मना कर दिया।
बैंकों के बारे में  यह जानकारी मिलने पर मुझे कई दुकानों में  लगी एक तख्ती याद आ गयी। अब तो व्यापारियों ने अच्छे-अच्छे शो रूम बना रखे हैं। बिल निकालने की मशीनें हैं, फिर भी उस तख्ती की गणित बरकरार है। दुकानों पर जो तख्ती लगी रहती थी, उस पर लिखा होता था कि ‘उधार प्रेम की कैंची है’ अर्थात् इस दुकान पर उधार नहीं मिलेगा, नकद पैसा दो और सामान लो। अब इस तख्ती के पीछे की गणित देखिए। उन सभी दुकानों पर सैकड़ों ग्राहक ऐसे होते हैं जो पूरे महीने उधार ही सामान ले जाते हैं। उनका खाता एक अलग रजिस्टर में  चलता रहता है। महीने भर बाद वेतन भोगियों को जब तनख्वाह मिलती है अथवा अस्थायी कर्मियों को पैसा मिलता है तो वे उधार चुकता करके अगले महीने फिर उधार ही सामान ले जाते हैं। कभी-कभी यह उधारी ज्यादा बढ़ जाती है तो दुकानदार हल्की चेतावनी देता है, कहता है कि पहले उधार चुका दो, तब सामान ले जाओ लेकिन अपने कस्टमर को नहीं छोड़ पाता। उसको सामान देता है क्योंकि उसे अपने बकाया रुपयों की चिंता होती है। सामान की बिक्री भी इसी तरह बढ़ती है। सामान नहीं बिकेगा तो मुनाफा कैसे मिलेगा? बड़े-बड़े शोरूम वाले भी होम डिलीवरी करते हैं। सामान पहले भेज देते हैं, पैसा बाद में  मिलता है। यहां भी ‘उधार प्रेम की कैंची है का फार्मूला दिखावे के लिए होता है। कभी-कभी पैसा डूब भी जाता है। सबसे ज्यादा इस प्रकार का धंधा पान-मसाला, चाय आदि की गुमटी, ठेला लगाने वाले करते हैं। उनके लिए कस्टमर को बांधे रखना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। हमारी बैंक भी यही धंधा कर रही है। यहां भी कमाऊ कस्टमर को ही प्राथमिकता दी जाती है।
यही कारण है कि 12 बड़े बकायेदारों पर तीन लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज चढ़ा हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को डूबते कर्ज का बड़ा हिस्सा कार्पोरेट क्षेत्र के पास है। सरकार ने 12 बकायेदारों की सूची जारी की है। इन पर दबाव बनाया गया है। इन गबनकर्ताओं को कर्ज चुकाने की दी गयी अवधि पूरी हो चुकी है। अब इन्साल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) की मदद से कर्ज वसूला जाएगा। टेक्सटाइल कंपनी आलोक इंडस्ट्रीज पर 29,912 करोड़ का कर्ज है। आटो कंपोनेंट बनाने वाली एमटेक आॅटो पर 12,586 करोड़, जहाज निर्माण की कम्पनी एबीजी शिप यार्ड पर 18,539 करोड़, इस्पात कम्पनी भूषण स्टील पर 55,989 करोड़, स्टील एवं बिजली उत्पादन में  लगी भूषण पावर एण्डी स्टील पर 48,52 करोड़, इलेक्ट्रो स्टील पर 13,302 करोड़, एस्सार स्टील पर 50,778 करोड़, ज्योति स्ट्रक्चर्स पर 8,078 करोड़, जेपी इन्फ्राटेक पर 13,322 करोड़, लैंको इन्फ्राटेक पर 59,505 करोड़, मोनेट इस्पात एण्ड एनर्जी स्टील कंपनी पर कुल कर्ज 10,412 करोड़ और इरा इन्फ्रा इंजीनियरिंग भी बकायेदारों की सूचीमें  शामिल है। इन सभी पर इसी वर्ष अप्रैल तक कर्ज न अदा करने पर कार्रवाई की जाएगी।
ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी और विक्रम कोठारी ही देश के खरबों रुपये दबाए हुए हैं और आंखें भी दिखा रहे हैं। इसी क्रम में  सरकार ने देश की 9500 गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की तरफ से भी देश की जनता को सावधान किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके वित्तमंत्री अरुण जेटली को अब लगाम कसनी पड़ेगी। बैंकों के आॅडिट पर जिम्मेदारी डालकर वे जनता के भरोसे को मजबूत नहीं कर सकेंगे। बैंकों को लेकर जिस स्तर पर भी ढिलाई हो रही है उसे दूर करना होगा और ऐसे हालात नहीं आने चाहिए जिससे देश की जनता बैंक में जमा अपने पैसे को लेकर चिंता करने लगे। (हिफी)

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