– सीएम का कंधा पकड़ चुनावी वैतरणी पार करेगी भाजपा!
सौरभ जैन “अंकित”-भोपाल। मध्यप्रदेश की चुनावी फिजां में रंगत अपने शबाब पर आ रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कर्मचारी जगत और गरीब जनता को साधने के भरपूर जतन करने के साथ ही रक्षाबंधन के मौके पर एक करोड़ बहनों को शुभकामना संदेश भेजकर उनका भी आशीर्वाद पाने पहल की। डाक विभाग ने मुख्यमंत्री की भावना से प्रदेश की महिलाओं को अवगत कराने खूब मेहनत की। हरसम्भव कोशिश की गई कि भाई का पैगाम बहनों तक राखी के दिन पहुंच जाये। एक करोड़ महिला मतदाताओं तक निजी तौर पर राखी का संदेश पहुंचाना आसान काम नहीं था। लेकिन भाई शिवराज और उनके प्रशासन ने डाक विभाग के सहयोग से इसे सुनिश्चित किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने यह संदेश पहुंचवाया कि इस पाती को पाकर यह समझना कि भाई खुद द्वार पर आया है। इसमें कोई शक नहीं कि मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश की महिलाओं के लिए अपने अब तक के कार्यकाल में काफी सम्वेदनशीलता दिखाई है। उन्होंने बेटियों के लिए कई योजनायें लाकर सारे देश का ध्यान आकर्षित किया है। उनकी योजनाओं को कई प्रदेशों ने अपने यहां लागू किया। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर कई प्रयास किये ताकि नारी उत्थान की दिशा में प्रगति हो। वे प्रदेश की बुजुर्ग महिलाओं के बेटे, महिलाओं के भाई और प्रदेश की बेटियों के चंदा मामा से भी प्यारे मामा हैं। महिला मतदाता वर्ग में शिवराज सिंह की व्यापक लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु गम्भीरता से प्रयास किये हैं। शिवराज के कंधों पर प्रदेश में लगातार चौथी बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे वर्ष 2008 और वर्ष 2013 में यह दायित्व बखूबी निभा चुके हैं। वर्ष 2003 में जब कांग्रेस की दस साल से चल रही सरकार को सत्ता से बाहर किया गया था, तब संघर्ष में शिवराज की भी भूमिका थी। हालांकि संगठन को सत्ता तक पहुंचाने में मुख्य भूमिका उमा भारती की थी और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन उनके पद त्याग और फिर बाबूलाल गौर को बदलने के बाद जब सत्ता संचालन शिवराज सिंह के हाथ में आया तो मध्यप्रदेश की प्रगति को पंख लग गये। देश के बीमारू राज्यों में शुमार मध्यप्रदेश ने शिवराज सिंह के नेतृत्व में तेजी से विकास की यात्रा शुरु की। आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जहां प्रगति न हुई हो। चलने लायक सड़कों के लिए तरसते प्रदेश में चकाचक सड़कों का जाल बिछ गया। बिजली के लिए तरसते प्रदेश में पर्याप्त बिजली आपूर्ति हो रही है तो गरीब जनता से लेकर किसानों तक राहत की बरसात हो रही है। सभी क्षेत्रों में बेहतर काम और उदार तथा सम्वेदनशील छवि बनाकर शिवराज सिंह ने अपने नेतृत्व में भाजपा को दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में शानदार सफलता दिलाई है। अब मध्यप्रदेश में वे तीसरी बार चुनावी नेतृत्व के लिए तैयार हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कर्मचारी जगत के हित में जिस मुस्तैदी से निर्णय लिये हैं, उनका प्रभाव यह है कि पड़ोसी छत्तीसगढ़ भी उनकी ही सरकार के ऐसे फैसलों का अनुसरण करता है। मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह के कामकाज से राज्य की जनता संतुष्ट हो सकती है। लेकिन चुनावी युद्व में अकेले योग्य सेनापति से काम चल जाये, इसकी गारंटी नहीं होती। हां, कुशल नेतृत्व व्यापक प्रभावी अवश्य होता है किंतु अन्य योध्दा भी सक्षम होना चाहिए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने चुनावी तैयारी में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। उन्होंने समय रहते सारे सियासी इंतजाम कर लिये हैं। लेकिन संगठन के स्तर पर वैसी सक्रियता दिखाई नहीं पड़ रही, जैसी होनी चाहिए। भाजपा हमेशा कहती है कि कार्यकर्ता ही चुनाव लड़ते हैं, प्रत्याशी तो मात्र प्रतीक होता है। भाजपा में संगठन ही सर्वोच्च ताकत है लेकिन मध्यप्रदेश की मौजूदा सियासी हलचल देखकर तो यही लगता है कि यहां भाजपा संगठन सारा दारोमदार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के भरोसे छोड़कर चैन की बंसी बजा रहा है। वैसे देखा जाय तो प्रत्याशी चयन से लेकर मैदानी तैयारियों तक हर स्तर पर संगठन की सक्रियता ही भाजपा की सफलता का राज रही है। परंतु शिवराज के राज में हुए कामकाज को जीत का अग्रिम प्रमाणपत्र मानकर संगठन खुशफहमी का शिकार हो गया है। अगर संगठन ऐसे ही ठंडा बना रहा तो कार्यकर्ताओं में जोश कौन भरेगा? कार्यकर्ता जीत तय मान कर घर बैठे रहेंगे तो शिवराज का विजय ध्वज लेकर दौड़ रहा घोड़ा अटक भी सकता है।

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