लखनऊ। थर्ड विंग नाट्य संस्था की ओर से शुक्रवार को हास्य नाटक बड़े मियां दीवाने का मंचन कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली ऑडिटोरियम में वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना के निर्देशन में किया गया। इसमें कंजूस बड़े मिंया की हरकतों ने दर्शकों को खूबहंसाया।

 फ्रांसीसी नाटककार मौलियर के मूल फ्रांसीसी नाटक “द माइज़र” के हज़रत आवारा द्वारा किये गये हिन्दी अनुवाद कंजूस को “बडे़ मियां दीवाने” शीर्षक से मंचित किया गया। महान नाटककार मौलियर के नाटकों की यह बड़ी खूबी है कि वह एक ओर जहां दर्शकों को अपनी शैली में हंसाते हैं वहीं वह हर नाटक में एक संदेश भी देते हैं। इस नाटक में मिर्ज़ा साहब को पैसों के खातिर किसी भी हद तक गिरते दिखाया गया।

 चुस्त अभियन और प्रभावी निर्देशन के माध्यम से जो कहानी अभिनेताओं ने मंच पर साकार की उसके अनुसार नाटक का नायक मिर्ज़ा सखावत बेग़ बेहद कंजूस है। उसके लिए पैसा रिश्तों से बढ़कर है। पिता की कंजूसी से उसका जवान बेटा बेटी भी आजिज आ चुके हैं। इन्तेहा तो तब होजाती है जब महज दहेज बचाने के खातिर मिर्ज़ा साहब अपनी ही बेटी, अजरा की शादी अधेड़ सेकरवाने के लिए रजामंद हो जाते हैं वहीं अपने जवान बेटे, फर्रूख की शादी बेवा से तय कर डालतेहैं।

 कहानी में तब दिलचस्प मोड़ आता है जब दर्शकों को पता चलता है कि मिर्ज़ा साहब का नौकर,अजरा का प्रेमी है। अपनी प्रेमिका के पास रहने के लिए वह भेष बदल कर रह रहा होता है। कहानी में तब और टविस्ट आता है जब खु़द मिर्ज़ा साहब का दिल मुफलिसी में अपनी मां के साथ रह रही मरियम पर आ जाता है। बाद में पता चलता है कि मरियम तो मिर्ज़ा साहब के साहबजादे फर्रूख से मोहब्बत करती है। इस बात से बेखबर मिर्ज़ा साहब एक ज़रूरतमंद औरत फरजीना के ज़रिये मरियम के घर शादी का पैगाम भिजवातें हैं। फर्रूख अपनी प्रेमिका मरियम की मदद करने के लिए अपने नौकर नम्बू की मदद से अपने पिता मिर्जा साहब की छिपाकर रखी गईं अशर्फियों को गायब करवा देता है। चूंकि कंजूस मिर्जा का दिल तो पैसों में अटका होता है इसलिए वह घरमें कोहराम मचा देते हैं। नाटक के अंत में फार्रुख, मरियम संग अपनी शादी तय करवाने की शर्त पर अपने पिता, मिर्ज़ा साहब को उनकी खोयीं अशर्फियां लौटा  देता है।

 मिर्ज़ा साहब की केन्द्रीय भूमिका में केशव पंडित पूरे नाटक में छाये रहे। नासिर की भूमिका में राजीव रंजन सिंह, अजरा के किरदार में नवनीत कौर भाटिया, नम्बू के चरित्र में तुषार बाजपेई,फरजीना के रोल में पारूल कान्त, साहूकार और असलम की भूमिका में रामेन्द्र लाल और मरियम के किरदार में वैष्णवी भाटिया ने भी अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीता। आनन्द अस्थाना के डिजाइन किए हुए सैट, रत्ना आनन्द की डिजाइन कास्ट्यूम संग मोहम्मद हफीज़ की लाइटिंग ने नाटक को प्रभावी रूप से गति प्रदान की।

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