जयंती पर विशेष-ग़ालिब की जयंती के मौके पर गूगल ने डूडल देकर इस महान शायर को सम्मान प्रकट किया है।
मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान “ग़ालिब” इनको उर्दू-फ़ारसी का महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है। ग़ालिब के लिखे पत्र, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, को भी उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है। उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का ख़िताब मिला। ग़ालिब ने अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने दी। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी। ग़ालिब नवाबी ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे और मुग़ल दरबार में उंचे ओहदे पर थे। ग़ालिब (असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। ग़ालिब शिया मुसलमान थे, पर मज़हब की भावनाओं में बहुत उदार एवं मित्रपराण स्वतंत्र चेता थे। जो आदमी एक बार इनसे मिलता था, उसे सदा इनसे मिलने की इच्छा बनी रहती थी। उन्होंने अपने बारे में स्वयं लिखा था कि दुनिया में यूं तो बहुत से अच्छे कवि-शायर हैं, लेकिन उनकी शैली सबसे निराली है- “हैं और भी दुनिया में सुख़न्वर बहुत अच्छे कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और” मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान “ग़ालिब” का जन्म- 27 दिसम्बर, 1797 में आगरा में हुआ था। निधन- 15 फ़रवरी, 1869 दिल्ली में।
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लांस नायक अल्बर्ट एक्का परमवीर चक्र से सम्मानित सैनिक थे। रांची, झारखण्ड (तत्कालीन बिहार) के निवासी थे। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में दुश्मनों के दाँत खट्टे करते हुए वह शहीद हो गए। इन्हें मरणोपरान्त सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे एकमात्र बिहारी थे, जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। अल्बर्ट एक्का का जन्म 27 दिसम्बर, 1942 को हुआ था। शहादत: 3 दिसम्बर, 1971 को मिली थी ।

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नित्यानंद स्वामी उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता थे। 27 दिसंबर 1927 को नारनौल (अब हरियाणा) में जन्मे थे। नित्यानंद स्वामी का अधिकांश जीवन देहरादून में ही बीता। उनके पिता वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून में तैनात थे। उनका विवाह चंद्रकांता से हुआ। नित्यानंद स्वामी स्वामी एक कुशल व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने वकालत को अपना पेशा बनाया। शुरुआत में वह कांग्रेस से जुड़े रहे और बाद में भाजपा से जुड़ गए। 12 दिसम्बर, 2012 को नित्यानंद स्वामी का निधन हुआ था। एजेंसी

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