“गिल्टी नॉट गिल्टी” नाटक ने दिया पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का संदेश

 लखनऊ।​ स्वप्निल संसार। किसी भी व्यक्ति के सम्बंध में सार्वजनिक रूप से अपनी राय अभिव्यक्त करते समय, अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर बात करनी चाहिये। अपनी पसंद – नापसंद के आधार पर कही गई हमारी बात किसी के लिये मृत्यु का कारण तक बन सकती है। इसी संदेश के साथ बुधवार को थर्डविंग संस्था की ओर से वरिष्ठ नाट्य निर्देशक पुनीत अस्थाना के कुशल निर्देशन में “गिल्टी – नॉट गिल्टी” नाटक का मंचन गोमती नगर के संत गाडगे ऑडिटोरियम में किया गया।

यह नाटक रेगिनॉल्ड रोज़ के मूल अमरीकी टेलीप्ले “12 एन्ग्री मैन” से प्रेरित है। अमरीका में इसी टेलीप्ले पर 1957 में “12 एन्ग्री मैन” फिल्म भी बनी है। हिन्दुस्तान में भी बासु चटर्जी के निर्देशन में 1986 में “एक रूका हुआ फैसला” सुपरहिट मूवी बनी थी। नाटक की कहानी 19 साल के लड़के के इर्दगिर्द घूमती है। उस लड़के पर अपने पिता के ख़ून का इल्ज़ाम है। इस मामले में गहनता से विचार करने के लिए एक जूरी का गठन किया जाता है। उस जूरी के सभी सदस्य किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और उसी के प्रभाव में इस लड़के को कसूरवार ठहरातें हैं पर उस जूरी का एक सदस्य उस युवक को कसूरवार मानने से इंकार कर देता है। वह जूरी के अन्य सदस्यों को भी इस मामले में दोबारा विचार करने का अनुरोध करता है। धीरे-धीरे वह अपने अकाट्य तर्कों से सभी जूरी सदस्यों को इस निष्कर्ष पर ले आता है कि वह युवक बेकसूर यानी नॉट गिल्टी है।

मूल अमरीकी नाटक में जूरी के सदस्यों की संख्या 12 है, जबकि इस प्रस्तुति में निर्देशक पुनीत अस्थाना ने बदलाव करते हुए जूरी सदस्यों की संख्या 11 रखी है। वहीं मूल नाटक से हट कर, दो महिला जूरी सदस्यों को भी रखा गया है। नाटक का पूरा परिवेश तनावपूर्ण होने के बावजूद कई मौकों पर दर्शकों को ठहाके लगाने पर भी मजबूर करता है। मुख्य विपक्षी जूरी सदस्य के रूप में केशव पंडित ने अपने मार्मिक अभिनय से दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। अपनी पाज़िटिव सोच के साथ, अपने अकाट्य तर्को से सभी जूरी मैम्बर्स को बेकसूर की राय देने के लिये सहमत करने वाले जूरी मैम्बर के रूप में, अपने सधे अभिनय से तुषार बाजपेई ने विशेष रूप से प्रभावित किया। अन्य जूरी मैम्बर्स में अली ख़ान, मनोज वर्मा, हरीश बडोला, निमेष भंण्डारी, रामेन्द्र लाल, आशुतोष विश्वकर्मा, श्यामली दीक्षित, अंजली अरोरा, अनिमेष श्रीवास्तव ने भी अपने सधे अभिनय से प्रभावित किया। कोर्ट क्लर्क की भूमिका में नवोदित प्रियांशु भटनागर ने भी अपनी पहचान छोड़ी। आनन्द अस्थाना के सेट डिज़ाइन ने वातावरण को प्रभावी बनाने में योगदान दिया। एम.हफीज़ की लाइट डिज़ाइन, रत्नांगी पण्डित की वेशभूषा परिकल्पना और रोहित पान्डे के संगीत और ध्वनि प्रभाव ने भी नाटक को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई।

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