जीतेन्द्र यादव की पत्नी को सरकारी नौकरी क्यों नहीं -नौशाद और मुस्तकीम के ह्त्या की जांच हो,सियासी पार्टियों के रवय्ये से मुसलमानों में नाराजगी -अलीगढ पुलिस बजरंग दल के इशारे पर नाचती है ? 
उबैद उल्लाह नासिर 
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ के नेत्रित्व में बन्ने वाली बीजेपी की सरकार में एनकाउंटरों (अधिकतर फर्जी ) में गुंडों (कथित ) को मौत के घाट उतारने के सिलसिला जारी है अब तक लगभग 1200 एनकाउंटर हो चुके हैं जिसमे लगभग 60 लोग मारे जा चुके हैं इन में कई मामलों की जांच भी चल रही है लेकिन देश विशेषकर प्रदेश में जो समाजी और सियासी माहौल बन गया है उसके देखते हुए इन सरकारी जान्चों से भई सच सामने की संभावना बहुत कम है मध्य प्रदेश मे जेल से भागे 8 कैदियों की पुलिस गोली से मौत को जिस प्रकार वहाँ के जांच कमीशन से सही बताया उसे जूता पहन के आँख में घुसने का मोहावरा चरितार्थ होता है सोशल मीडिया पर एक पहाड़ी पर चढ़े उन आठों के फोटो वायरल हुए थे और सबने देखा था की वह निहत्थे और हाथ उठाये हुए थे पर भी कमीशन के न्यायमूर्ती ने उनके द्वारा फायरिंग करना साबित करके उनके क़त्ल को सही बता दिया था दरअसल आज देश की सभी संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाएं हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित लोगों से भर दी गयी है जिसके कारण उनकी विश्वासनीयता क्षीण हो चुकी है जो जज मोर के आंसू से मोरनी के गर्भवती होने की बात करता हो उसके फैसलों और निष्कर्षों पर कौन विश्वास करेगा ऐसे कितने जज और अफसरशाह इन संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुखिया बना दिए गए हैं । उत्तर प्रदेश में हो रही इन कथित मुडभेड़ों की एक विशेषता यह भी है की अधिकतर मारे गए बदमाश मुस्लिम दलित और पिछड़े वर्ग के हैं विगत दिनों लखनऊ में एक बड़ी कम्पनी के अफसर विवेक तिवारी भी पुलिस की गोली स्वर्गवासी हुए तो पूरे प्रदेश में हंगामा मच गया पक्ष और विपक्ष के सियासतदानों में पीड़ित परिवार से हमदर्दी की होड़ लग गयी सरकार ने तुरंत 25 लाख रुपया मुआवजा मृतक की पत्नी को सरकारी नौकरी और उसके बच्चों के शिक्षा का खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी ले ली क्रिया करम के बाद जब मकतूल की बेवा और उसके बच्चे मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ से मिलने गए तो मुख्यमंत्री ने दोनों बच्चों के लिए पांच पांच लाख और उसकी माता के लिए भी पांच लाख की सहायता राशि देने का एलान कर दिया इस प्रकार मृतक के परिवार को चालीस लाख की सहायता राशि बेवा को सरकारी नौकरी और बच्चों की मुफ्त पढ़ाई का प्रबंध हो गया । किसी को भी मृतक विवेक तिवारी के परिवार को इस प्रकार मिली सहायता पर एतराज़ नहीं हो सकता लेकिन जब सहायता और अनुकम्पा में धर्म और जाति की बुनियाद पर खुला भेदभाव किया जाए तो सवाल उठना लाज़मी है सोशल मीडिया पर इसको ले कर एक पोस्ट खूब वायरल हो रही है जिसके अनुसार “उच्च जाति का मरे तो 40 लाख, पिछड़ा,दलित मरे तो 25 लाख और मुस्लिम फ्री “ ।

यही नहीं अलीगढ काण्ड को लेकर सभी सियासी दलों और उनके नेताओं ने जो चुप्पी साधी या अधिक से अधिक बयान जारी कर के अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया जबकि विवेक तिवारी काण्ड में हमदर्दी जताने की जो होड़ लगी थी उसे ले कर भी अल्पसंख्यकों में भारी नाराजगी पायी जाती है  । वैसे तो उत्तर प्रदेश में ऐसे एनकाउंटर बहुत हो रहे हैं लेकिन दो तीन एनकाउंटर जो आज विशेष चर्चा में हैं उन में अलीगढ के नौशाद और मुस्तकीम नामी दो नवजवानों और नॉएडा के जिम ट्रेनर जितेन्द्र यादव का एनकाउंटर शामिल हैं,वह एक ट्रेनी सब इंस्पेक्टर की गोली से आठ माह पूर्व ज़ख़्मी हो गए थे आठ महीने तक अस्पताल में पड़े रहने के बाद जब उनका परिवार उनके इलाज का खर्च नहीं उठा पाया तो उन्हें घर ले आया है गोली लगने से उनका कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो गया केवल ऊपरी हिस्से में हरकत है,उनकी जिंदगी तो नरक हो ही गयी उनके सामने सब से बड़ी समस्या अपना घर चलाने और अपने बच्चों की शिक्षा आदि जरी रखने का है समाज के कुछ प्रबुद्ध और दानी लोगों ने उनके खाते में कुछ पैसे जमा कराये हैं लेकिन क्या पहाड़ जैसी जिंदगी इस प्रकार के चंदे के सहारे गुज़र सकती है,क्या उत्तर प्रदेश सरकार उनकी पत्नी को अनुकम्पा के आधार पर सरकारी नौकरी नहीं दे सकती विवेक तिवारी और जीतेन्द्र यादव के मामलों में यह दोहरा सुलूक क्यों ?
अलीगढ़ के दो लड़कों का मामला तो और भी शर्मनाक और पुलिस व सरकार की क्रूरता और अमानवीय चेहरा और सोच उजागर करने वाला है जिले के अतरौलिया थाना के तहत एक गाँव में एक साधू की ह्त्या हो जाती है पुलिस इस मामले में कुछ हिन्दू लड़कों को गिरिफ्तार करती है जिनका सम्बन्ध कथित तौर से बजरंग दल से बताया जाता है वहां के सांसद राजवीर सिंह पुलिस पर दबाव बना के इन लड़कों को छोडवा देते है,लेकिन पुलिस पर हत्यारों की गिरिफ्तारी का दबाव है कहा जाता है की ऐसे में उस की मदद को आते हैं एक हाजी साहब वह नौशाद और मुस्तक़ीम नाम के दो लड़कों को पकडवा देते हैं इन में एक की आयु 17 वर्ष और दुसरे की 22 वर्ष बतायी जाती है,बताया जाता है की यह दोनों लड़के जिसमे एक सिलाई का काम करता है दूसरा किसी कपडे की दूकान पर नौकर है दोपहर में खाना खाने घर आये थे जब पुलिस उन्हें उठा ले गयी उसके घर वाले जब कुछ लोगों के साथ थाने पहुंचे तो उन्हें बताया गया की वह अतरौलिया नहीं हरदुआ गंज थाने में हैं वहां पहुंचे तो वहां भी उनका कोई पता नहीं चला दो दिनों तक उन्हें छुपा के रखने के बाद पुलिस ने मीडिया को बुला के उनका एनकाउंटर कर दिया जिसकी विडियो भी बनवा ली । पुलिस कहती है की यह दोनों हिस्ट्री शीटर थे 17 और 22 साल के लड़के कितने बड़े हिस्ट्री शीटर होंगे इसे कोई भी सही सोच रखने वाला समझ सकता है दूसरी बात यह की उनका पुलिस रिकॉर्ड कैसा भी रहा हो पुलिस ने उन्हें उनके घर से ज़िंदा पकड़ा था और मीडिया वालों के सामने उन्हें गोली मारी थी इससे वह लाख कोशिशों के बावजूद छुपा नहीं सकती  ।

इस फर्जी एनकाउंटर पर सरकार और पुलिस चाहे जितना पर्दा डालने की कोशिश करे सच्चाई छुप नहीं सकी पूरी बात जान्ने कम लिए जब दिल्ली की स्वयम सेवी संस्था Unite against hate के कार्यकर्ता जाय वारदात पर पहुंचे तो उन्हें बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने घेर लिया पुलिस का रवय्या भी खतरनाक था एक तरह से वह बजरंग दल कार्यकर्ताओं के इशारे पर ही काम कर रही है यहाँ तक की थाणे में बैठे इन लोगों की मौजूदगी की सूचना खुद थानेदार ने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को दी जिससे वह थोड़ी देर में ही दो गाड़ियों में भर के थाणे पहुँच गए मक्तूलों की मा और पत्नी से इन लोगों के मिलने के समय यह लोग वहीं मौजूद रहे जिससे वह लोग कोई बात नहीं कर सके किसी तरह वह मजबूर महिला दिल्ली पहुंची और वहां पत्रकारों के सम्मुख अपनी बात राखी तो पुलिस ने उलटा उन कार्यकर्ताओं पर इस महिला के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया ,लखनऊ की समाज सेवी संस्था रिहाई मंच के अध्यक्ष शोएब साहब राजीव यादव अदि जब वहां पहुंचे तो उन्हें भी बजरंग दल के हिंसक कार्यकर्ताओं का समाना करना पडा अभी दो दिन पहले समाजवादी पार्टी के नेता सुश्री पंखुड़ी पाठक अपने साथियों के साथ गयीं तो वह भी मोब लिंचिंग का शिकार होते होते बचीं यह सब हालत बता रहे हैं की अलीगढ पुलिस की बागडोर प्रक्टिकली बजरगं दल कार्यकर्ताओं के हाथ में है अलीगढ के SP अजय साहनी फर्जी मुडभेड़ोंके लिए बदनाम रहे है आज़म गढ़ में भी उन्होंने ऐसे कई काण्ड करवाए थे  ।
इस परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है की अलीगढ से अपने घर वापस आने के लिए उनके पास किराए के पैसे नहीं थे तो एक दरोगा ने अपने पास से उसे 100 रुपया दे के वापस किया यदि वह लड़के हिस्ट्री शीटर होते तो क्या उनके घर की आर्थिक स्थित ऐसी होती समझा जा सकता है की इन्साफ की इतनी खरचीली और कठिन लड़ाई यह परिवार कैसे लड़ पायेगा  ।
रिहाई मंच के अध्यक्ष शोएब साहब आदि ने लखनऊ वापस आ कर इस फर्जी एनकाउंटर के खिलाफ मानव अधिकार आयोग और DGP के यहाँ दरख्वास्त लगाई है शोएब साहब का संगठन फर्जी तौर से फंसाए गए नवजवानों की रिहाई की कानूनी लड़ाई लड़ता है हिन्दुत्ववादी गुंडे वकील उन पर कचेहरी में हमला भी कर चुके हैं लेकिन यह दुबला पतला गांधी वादी वकील इन्साफ की इस लड़ाई में मज़बूत चट्टान की तरह खड़ा है जबकि नवजवान पत्रकार राजीव यादव और उनके अन्य साथी बड़े से बड़ा खतरा उठा कर भी यह लड़ाई लड़ते रहे हैं उधर दिल्ली में unite against hate और अन्य स्वयम सेवी संस्थाएं भी पूरी ताक़त से इस अत्याचार के खिलाफ लड़ रही है ।

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