बॉलीवुड की फिल्मों में आपने एक से बढ़कर एक ख़तरनाक खलनायकों को देखा होगा। कई खलनायकों के तो नाम भी आपको याद होंगे, लेकिन जब बात आती है खलनायिका की तो हिंदी फिल्मों के शुरुआती दौर की खलनायिकाओं में कुलदीप कौर की अपनी शान थी। शादीशुदा कुलदीप और शादीशुदा प्राण लंबे समय तक अच्छे मित्र रहे। विभाजन के दौरान दोनों लाहौर छोड़ बम्बई अब मुंबई आ गए। लेकिन जल्दबाजी में प्राण की कार लाहौर में ही रह गई और वह लाहौर जाकर अपनी कार लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। तब दंगों की परवाह किए बिना कुलदीप कौर ने प्राण की कार लाहौर से चला कर बम्बई अब  मुंबई पहुंचा दी। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतनी हिम्मती कुलदीप काैर की मौत मात्र  कांटा गड़ने से हुई थी।
लाहौर के खाते  पीते परिवार में 1927 को पैदा हुई थी कुलदीप कौर। 14 साल की किशोर उम्र में ही महाराजा रणजीत सिंह के कमांडर जनरल शाम सिंह अटारीवाला के प्रतिष्ठित परिवार में उनकी शादी मोहिंदर सिंह सिद्धू से कर दी गई थी। 16 साल में ही वह मां बन गयी थीं और अभिजात समाज की जीवनशैली अपनाने के बाद उनकी झिझक खत्म हो गई थी और वह बिंदास बन गई थीं। अमृतसर और लाहौर के अभिजात समाज को देखने-समझने के बाद और फिल्मों की चमक दमक से प्रभावित होकर कुलदीप कौर ने फिल्मों में जाने का मन बना लिया था। संपन्न घराने की तो वह थी ही और उनका ससुराल भी प्रतिष्ठित था। उनका पति भी उदार था और चाहता था कि उसकी पत्नी उस अभिजात्य समाज का हिस्सा बने, जिसमें क्लब, जिमखानों और पांच सितारा होटलों में घूमना जिंदगी का  हिस्सा है।
उस समय लाहौर में अभिनेता प्राण का खूब दबदबा था। कुलदीप कौर प्राण के अंदाज पर कुर्बान थीं और वह उनसे मिलने पहुंच गईं। धीरे–धीरे दोनों में दोस्ती हुई और दोनों की दोस्ती पक्की हो गई।
लेकिन बम्बई अब मुंबई में कुलदीप कौर का जब बॉम्बे टॉकीज में ऑडीशन लिया गया तो उनके हीरोइन बनने के अरमानों पर उनके चेहरे से बाहर भागती लंबी नाक और सपाट टुड्ढी ने पानी फेर दिया। हीरोइन की भूमिका में तो वह फिट नहीं हो रही थीं, लिहाजा उन्हें सहायक भूमिकाएं और खलनायिका की भूमिकाओं के लिए फिट पाया गया। उस दौर में महिलाओं का फिल्मों में काम करना ओछी नजरों से देखा जाता था और प्रतिष्ठित घरानों की महिलाएं फिल्मों में काम करने से झिझकती थीं, ऐसी स्थिति में फिल्मों में खलनायिका की भूमिका करने के लिए कोई लड़की कैसे तैयारी होती? उस दौर में हीरोइन बनने के लिए तो महिलाएं हिम्मत जुटा रही थीं। देविका रानी से लेकर दुर्गा खोटे तक फिल्मों में सक्रिय हो चुकी थीं। मगर खलनायिकाओं का अकाल ही था। ललिता पवार जरूर हीरोइन की भूमिकाएं छोड़ नकारात्मक भूमिकाएं निभा रही थीं, जो उनकी मजबूरी थी। दरअसल उनके चेहरे पर एक फिल्म की शूटिंग के दौरान भगवान दादा का थप्पड़ जोर से पड़ गया था। इसके कारण उनके आधे चेहरे पर लकवा मार गया था और उनकी एक आंख छोटी हो गई थी जिसके कारण उन्हें हीरोइन की भूमिकाएं मिल नहीं रही थीं। छिटपुट अभिनेत्रियों को छोड़ दें, तो कुल मिला कर खलनायिका की भूमिकाओं के लिए मैदान खाली था।
इस दौर में नरगिस, नूतन, नसीम बानो से लेकर निम्मी तक और मधुबाला से लेकर मीना शौरी तक के चर्चे थे, ऐसे में लाहौर से आई इस लड़की ने खलनायिका की भूमिकाओं के खालीपन को भरने की कोशिश की।1948 में उनकी पंजाबी फिल्म ‘चमन’ अच्छी चली। फिर इसी साल देव आनंद की हिट फिल्म ‘जिद्दी’ और ‘गृहस्थी’ भी रिलीज हुई। दोनों में प्राण ने भी काम किया था।उसके बाद ‘एक थी लड़की’, ‘समाधि’, ‘अफसाना’, ‘बैजू बावरा’, ‘ अनारकली’ की सफलता ने कुलदीप कौर को सहायक अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर दिया। उन्होंने 1948 से लेकर 1960 तक मात्र 12 सालों में 100 से ज्यादा फिल्में कीं। लेकिन एक अजीब हादसे ने बहुत ही कम उम्र में उनकी जान ले ली। दरअसल शिर्डी जाते समय उनके पैर में कांटा चुभ गया था लेकिन अपनी धुन में मस्त और बेपरवाह कुलदीप ने इसकी ज़रा सी भी परवाह नहीं की और उन्हें इसी से सेप्टिक हो गया इसी सेप्टिक ने 3 फरवरी 1960 को उनकी जान ले ली।एजेन्सी। 

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