मानसी सिन्हा। 1960 और 1970 दशक के जाने माने अभिनेता तरुण बोस का जन्म 14 सितंबर 1928 को कलकत्ता अब कोलकत्ता में हुआ था , जो 1960 और 1970 के दशक के दौरान बॉलीवुड में सक्रिय थे।  हालाँकि वे नागपुर में बड़े हुए, जहाँ उन्होंने सेंट फ्रांसिस हाई स्कूल में पढ़ाई की। अपनी किशोरावस्था में उन्होंने स्थानीय नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया और 15 साल की उम्र में उन्होंने नए खुले ऑल इंडिया रेडियो, नागपुर के लिए ऑडिशन दिया, जहाँ वे रेडियो नाटकों में काम करने के लिये चुन लिये गये।
अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग में काम करना शुरू कर दिया, ताकि वे बिना किसी पारिवारिक दबाव के अपने अभिनय को आगे बढ़ा सकें।
तरुण बोस ने अपना फ़िल्मी डेब्यू 1957 में असित सेन की फ़िल्म, अपराधी कौन से किया जिसमें माला सिन्हा और अभि भट्टाचार्य भी थे। बिमल रॉय की सुजाता (1959) में उनके अभिनय को सराहा गया था, जहाँ उन्हें नूतन, सुनील दत्त और सुलोचना के साथ कास्ट किया गया था।

तरुण बोस को गुमनाम,बंदिनी (1963), अनुपमा (1966), देवर, मुझसे जीने दो (1963), आन मिलो सजना और साठ के दशक और सत्तर के दशक की कई अन्य फिल्मों में उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए जाना गया। उन्होंने अशोक कुमार, धर्मेंद्र, मनोज कुमार, सुनील दत्त, बलराज साहनी और अमिताभ बच्चन जैसे प्रख्यात अभिनेताओं के साथ काम किया है। निर्देशकों में, उन्होंने बिमल रॉय, हृषिकेश मुखर्जी, सत्येन बोस, असित सेन, दुलाल गुहा और अन्य के साथ काम किया है।उन्होंने 1957 और 1974 के बीच कम से कम 41 फिल्मों में अभिनय किया और मध्यवर्गीय पेशेवर हस्तियों, विशेषकर डॉक्टरों और कभी-कभी न्यायाधीशों या वकीलों की भूमिका निभाने के लिए ख्याति प्राप्त की।

उनकी पहली फ़िल्म ‘अपराधी कौन’ 1957 में असित सेन के निर्देशन में बनी थी, पर उन्हें असल पहचान मिली फिल्म मधुमती (1958), ‘बंदिनी’ (1963), ‘गुमनाम’ (1965) और ‘अनुपम’ (1966) से। वे अपने हर किरदार को बड़े सरल तरीके से निभाते थे। मध्यम वर्गीय व्यक्ति के सकारात्म अभिनय के लिए वे अपने दौर के चहेते अभिनेता बने। उनकी आखिरी फिल्म ‘जीवन संगम’ जो कि 1974 को बड़े पर्दे पर आई थी।

1949 में उनकी शादी हुई थी। उनका एक बेटा और एक बेटी थी। वे निजी जिंदगी में बेहद चंचल स्वभाव के थे। वे अक्सर बच्चों के साथ बच्चे बनकर खेला करते थे। उनकी बेटी शिल्पी बोस का कहना है कि उनके पिता की कोई बहन न होने के कारण उन्हें ये कमी बहुत खलती थी। यही कारण था कि उन्हें अपनी बेटी से बहुत लगाव था। उन्हें कुत्तों से काफी प्यार था। उनके सबसे पहले पाले हुए कुत्ते का नाम ‘जैक’ था जिसे वे अपने जैकेट के जेब में रख कर लाये थे।

उनका निधन 8 मार्च 1972 को 44 वर्ष की उम्र में कलकत्ता अब कोलकत्ता में हुआ था। उस ही दिन उनकी बेटी का जन्मदिन भी था। 

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