शंकर जयकिशन हिन्दी फिल्मों की  प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी थी। भारतीय फिल्मों में जब भी सुकून और ताजगी का अहसास देने वाले मधुर संगीत की चर्चा होती है। संगीतकार जयकिशन और उनके साथी शंकर की बरबस ही याद आ जाती है। वह पहली संगीतकार जोड़ी थी, जिसने लगभग दो दशक तक संगीत जगत पर बादशाह की हैसियत से राज किया और हिन्दी फिल्म संगीत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता दिलाने का काम किया। राग भैरवी के अदभुत चितेरे शंकर सिंह रघुवंशी और जयकिशन पंचोली अपने जीवन काल में ही एक जीते जागते युग बन गये थे। शंकर और जयकिशन का संगीत अवाम का संगीत तो था ही क्योंकि राज कपूर जैसे जनता के लाड़ले कलाकार और उनका करीबी संग साथ था.लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहेंगे कि शास्त्रीय संगीत के लिये जब जब भी कोई स्थान निकला एस.जे अपने बेस्ट फार्म में नजर आए। इस बात की पुष्टि के लिये 1956 में बनी फिल्म बसंत बहार के रूप में एक ही उदाहरण काफी है।
शंकर और जयकिशन के पूरे संगीत में से यदि लताजी को निकाल दिया जाए तो वह बेसुरा सा प्रतीत होगा। इस जोड़ी ने लताजी के साथ ऐसी रचनाएं की जो फिल्म संगीत का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। शंकर और जयकिशन ने आर्केस्ट्रेशन में भव्यता के नये सोपान रचे। वॉयलिन, सितार, ढोलक, बाँसुरी के साथ एकॉर्डियन का खूबसूरत इस्तेमाल इस जोड़ी ने किया।साथ ही क्लेरोनेट,चौलो,मेण्डोलिन भी शंकर और जयकिशन के संगीत में बहुत मधुर सुनाई दी है। लेकिन यह भी महसूस कीजियेगा कि यदि श्रोता बिरादरी की बिसात पर आज बज रहे गीत बड़े आर्केस्ट्रा की जरूरत नहीं है तो नहीं है । जरूरत के मुताबिक शंकर जयकिशन नें यहाँ एकदम सॉफ्ट धुन सिरज दी है।
1966 में संगीतकार शंकर जयकिशन की जोड़ी टूट गयी थी फिल्म थी सूरज इस फिल्म में शंकर ने शारदा को मौका दिया गाना था तितली उडी उड़के चली ,गाना हिट हुआ,शंकर जयकिशन की जोड़ी टूट गयी कुछ साल के बाद जयकिशन की मौत हो गयी,शारदा को सिर्फ शंकर की फिल्मों में ही गाने के मौके मिले किसी और संगीतकार ने शारदा की तरफ नहीं देखा,शंकर ने कई साल तक शारदा को मौका दिया,निर्माता सोहन लाल कंवर ने शंकर और लता जी में सुलह करवा दी फिल्म थी सन्यासी 1975। शंकर ने शारदा को ब्रेक क्या दिया .लता ने शंकर के कंपोजीशन में गाना ना गाने का प्रण कर लिया । उन्हीं दिनों राजकपूर अपने सपनों की फिल्म मेरा नाम जोकर के निमार्ण में लगे थे । राजकपूर की बाकायदा एक टीम थी जिसमें लता,मन्ना डे, मुकेश,शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे।
मेरा नाम जोकर में शंकर जयकिशन बाकायदा अपने कंपोजिशन तैयार कर चुके थे । अचानक लता ने राजकपूर से कहा कि शंकर को फिल्म से निकालो तभी मैं आपकी फिल्म में स्वर दे सकूंगी । राजकपूर के लिए ये कठिन मरहला था । राजकपूर ने शंकर को फिल्म से बाहर करने से इनकार कर दिया,मेरा नाम जोकर हिन्दी फिल्म इतिहास की बहुत बडी फिल्म होकर भी बाक्स आफिस पर पिट गयी । लोगों ने कहा लता ने नही गाया तो फिल्म को तो पिटना ही था। राजकपूर का एक बडा सपना खाक हो चुका था। खैर उसके बाद बाबी बनी , राजकपूर ने शंकर को चलता कर दिया, लता जी ने इस फिल्म में अपना बहुमूल्य सुर दिया। फिल्म ने टिकट खिडकी पर सफलता के झंडे गाड दिये। वाणी जयराम, हेमलता,चंद्राणी मुखर्जी , रुना लैला, सुधा मल्हो्त्रा ,प्रीती सागर ये कुछ ऐसे नाम है जो प्रतिभा संपन्न होने के बाबजूद लता की हेकडी के आगे नही टिक सकी और गुमनामियों के अंधेरे में खो गई।स्वर साम्रागी लता मंगेशकर आज जिस मुकाम पर हैं। वहां तक उनके पहुंचने में इस जोड़ी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। लता मंगेशकर के कैरियर को बुलंदी पर पहुंचाने में दो फिल्मों, महल और बरसात की अहम भूमिका रही। दोनों ही फिल्में 1949 में प्रदर्शित हुई थीं। पहली फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने दिया था और दूसरी फिल्म के संगीतकार जयकिशन और शंकर थे। यही वह फिल्म थी, जिससे उनके साथ गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी तथा अभिनेत्री निम्मी ने भी अपने कैरियर का आगाज किया था। इस फिल्म में शंकर जयकिशन ने गीतों की एक से बढकर एक ऐसी सरस और कर्णप्रिय धुनें बनाई थीं कि यह फिल्म गीत और संगीत की दृष्टि से बालीवुड के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है। मेरी आंखों में बस गया कोई रे, जिया बेकरार है छाई बहार है, मुझे किसी से प्यार हो गया, हवा में उडता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का, अब मेरा कौन सहारा, बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बिछड गई मैं घायल हिरनी, बन बन ढूंढूं, जैसे गीतों की ताजगी आज भी कम नहीं हुई है। लता मंगेशकर बड़ी विनम्रता से अपने कैरियर में मौलिक प्रतिभा की धनी इस संगीतकार जोड़ी के योगदान को स्वीकार करती हैं। जब भी शंकर जयकिशन का उनके सामने जिक्र होता है। वह कहना नहीं भूलतीं। उन्होंने शास्त्रीय, कैबरे, नृत्य, प्रेम तथा दुख और खुशी के नगमों के लिए स्वर रचनाएं की। उनके संगीत ने कई फिल्मों को जिन्दगी दी। अन्यथा वे भुला दी जातीं।
15 अक्टूबर 1922 को जन्मे शंकर के पिता रामसिंह रघुवंशी मूलत मध्य प्रदेश के थे और काम के सिलसिले में हैदराबाद में बस गये थे। शंकर को शुरु से ही कुश्ती का शौक था और उनका कसरती बदन बचपन के इसी शौक का परिणाम था। घर के पास के एक शिव मंदिर में पूजा अर्चना के दौरान तबला वादक का वादन भी बचपन में बहुत आकर्षित करता था। तबला बजाने की लगन दिनों दिन बढ़ती गयी। महफिलों में तबला बजाते हुए उस्ताद नसीर खान की निगाह उन पर पड़ी और शंकर उनके चेले हो गये। माली हालात ऐसे थे कि ट्यूशन भी करनी पड़ी। कहते हैं कि हैदराबाद में ही एक बार किसी गली से गुजरते हुए तबला सुनकर शंकर एक तवायफ के कोठे पर पहुँच गये और तबला वादक को गलत बजाने पर टोक दिया। बात बढ़ी तो शंकर ने इस सफाई से बजाकर अपनी काबिलियत का परिचय दिया कि वाह वाही हो गयी। शंकर अपनी कला को और निखारने के लिए एक नाट्य मंडली में शामिल हो गये, जिसके संचालक मास्टर सत्यनारायण थे और हेमावती ने बम्बई जा कर पृथ्वी थियेटर्स में नौकरी कर ली, तो शंकर भी 75 रुपये प्रतिमाह पर पृथ्वी थियेटर्स में तबला वादक बन गये। पृथ्वी थियेटर्स के नाटकों में कुछ छोटी-मोटी भूमिकाएँ मिलने लगीं और वहीं शंकर ने सितार बजाना भी सीख लिया। शंकर जयकिशन की मुलाकात भी अजीब ढंग से हुई। ऑपेरा हाउस थियेटर के पास की व्यायामशाला में कसरत के लिए शंकर जाया करते थे और वहीं दत्ताराम से उनकी मुलाकात हुई। दत्ताराम शंकर से तबले और ढोलक की बारीकियाँ सीखने लगे, और एक दिन उन्हें फिल्मों में संगीत का काम दिलाने के लिए दादर में गुजराती फिल्मकार चंद्रवदन भट्ट के पास ले गये। वहीं जयकिशन भी फिल्मों में काम की तलाश में आये हुए थे। इंतजार के क्षणों में ही बातों में शंकर को पता चला कि जयकिशन हारमोनियम बजाते थे। उस समय सौभाग्य से पृथ्वी थियेटर में हारमोनियम मास्टर की जगह खाली थी। शंकर ने प्रस्ताव रखा तो जयकिशन झट से मान गये और इस तरह पृथ्वी थियेटर्स के परचम तले शंकर और जयकिशन साथ साथ काम करने लगे। पठान में दोनों ने साथ साथ अभिनय भी किया। काम के साथ साथ दोस्ती भी प्रगाढ़ होती गयी। शंकर साथ साथ हुस्नलाल भगतराम के लिए भी तबला बजाने का काम करते थे और दोनों भाइयों से भी संगीत की कई बारीकियाँ उन्होंने सीखीं। पृथ्वी थियेटर्स में ही काम करते करते शंकर और जयकिशन राजकपूर के भी करीबी हो गए। हालाँकि राज कपूर की पहली फिल्म के संगीतकार थे पृथ्वी थियेटर्स के वरिष्ठ संगीतकार राम गाँगुली और शंकर जयकिशन उनके सहायक थे, लेकिन बरसात के लिए संगीत की रिकार्डिंग के शुरुआती दौर में जब राजकपूर को पता चला कि बरसात के लिए बनायी एक धुन राम गाँगुली उसी समय बन रही एक दूसरी फिल्म के लिए प्रयुक्त कर रहे हैं तो वे आपा खो बैठे। शंकर जयकिशन की प्रतिभा के तो वो कायल थे ही और जब उन्होंने शंकर के द्वारा उनकी लिखी कम्पोजिशन अम्बुआ का पेड़ है, वही मुडेर है, मेरे बालमा, अब काहे की देर है की बनायी धुन सुनी तो उन्होंने राम गाँगुली की जगह शंकर जयकिशन को ही बरसात का संगीत सौंप दिया। यही धुन बाद में जिया बेकरार है, छायी बहार है के रूप में बरसात में आयी। फिल्म बरसात में उनकी जोड़ी ने जिया बेकरार है और बरसात में हमसे मिले तुम सजन जैसा सुपरहिट संगीत दिया। फिल्म की कामयाबी के बाद शंकर जयकिशन बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे सफल हो गये। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फिल्म बरसात से ही गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी। फिल्म बरसात की सफलता के बाद शंकर जयकिशन राजकपूर के चहेते संगीतकार बन गये। इसके बाद राजकपूर की फिल्मों के लिये शंकर जयकिशन ने बेमिसाल संगीत देकर उनकी फिल्मों को सफल बनाने मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जयकिशन और शंकर की जोडी ने लगभग 170 से भी ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया। उनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं बादल ,नगीना (१951) पूनम (1952) शिकस्त(१९53)सीमा(1955)बसंत
बहार,चोरी-चोरी,नईदिल्ली,राजहठ (1956) कठपुतली (1957) यहूदी (१958) अनाडी,छोटी बहन, कन्हैया, लव मैरिज (1959) दिल अपना और प्रीत पराई, जिस देश में गंगा बहती है (1960) जब प्यार किसी से होता है, जंगली,ससुराल(1961)असली नकली, प्रोफसर (1962) दिल एक मंदिर, हमराही (1963)राजकुमार (1964) आम्रपाली, सूरज,तीसरी कसम (1966) ब्रह्मचारी, कन्यादान,शिकार (1968) मेरा नाम जोकर (1970) अंदाज, लाल पत्थर (1971) संन्यासी (1975)। जयकिशन और शंकर को चोरी चोरी (1956)अनाडी (1959) दिल अपना और प्रीतपराई (1960),प्रोफेसर(1963)सूरज(1966) ब्रह्मचारी (1966) मेरा नाम जोकर (1970) पहचान (1971) और बेईमान (1972) के लिए नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। अंतिम तीन पुरस्कार तो उन्हें लगातार तीन वर्ष तक मिले। शंकर का निधन दिल का दौरा पडने से 26 अप्रैल, 1987 की रात में हुआ, दुनिया को उनके अंतिम संस्कार के एक दिन बाद उनकी मौत के बारे में पता चला। एजेन्सी।

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