लखनऊ। स्वप्निल संसार। लखनऊ महोत्सव की चौथी शाम को मुख्य पंडाल शास्त्रीय गायन के फन से महक उठा। गायकी की दुनिया में तेजी से ऊंचे मुकाम हासिल कर रहीं श्रीमती स्वागता मुखर्जी ने राग जोग का आलंबन लेकर श्रोताओं पर रस वर्षा की। उन्होंने मध्य लय तीन ताल में बंदिश ‘साजन मोरे घर आये’ से श्रोताओं को अपने साथ बखूबी जोड़ा। तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच द्रुत लय एक ताल में बंदिश ‘घड़ी पल छिन न सुहाये’ सुनाकर उन्होंने मन मोह लिया। उनके साथ तबले पर पार्थ प्रतिम मुखर्जी और हारमोनियम पर कमला कान्त ने संगत की।
तय कार्यक्रम के मुताबिक श्रीमती स्वागता के भजन गाने की उद्घोषणा भी हुई, लेकिन समयाभाव बताकर भजन गाने से पहले ही अगले कलाकार के आने की उद्घोषणा कर दी गयी। इस तरह लखनऊ के लोग उनका भजन सुनने से वंचित रह गए।
कोमल सुर और पक्के गले वाली श्रीमती स्वागता मुखर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल के एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। पांच वर्ष की नाजुक उम्र में अपने पिता स्वपन कुमार चक्रवर्ती से संगीत शिक्षा की शुरुआत करने वाली स्वागता ने विदुषी श्रीमती सुनन्दा पटनायक से भी गायन सीखा। उन्होंने रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में संगीत संकाय के डीन रहे पंडित आलोक चटर्जी और पंडित अमिय रंजन बन्दोपाध्याय से गुरु-शिष्य परम्परा में शास्त्रीय गायन की बारीकियां सीखीं।
रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय से 2006 में एमए शास्त्रीय गायन की परीक्षा में टॉप करने वाली श्रीमती स्वागता ने संगीत विशारद शास्त्रीय गायन और नजरुल गीति की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस दौरान वह कोलकाता में आयोजित शास्त्रीय संगीत की कई प्रतिष्ठापरक प्रतियोगिताओं में अपने सुरों का लोहा मनवाते हुए प्रथम स्थान प्राप्त करती रहीं। इनमें ईस्ट कोलकाता क्लासिकल म्यूजिक कम्पीटीशन, यंग टैलेण्ट कम्पीटीशन, एनआरएस इयरली म्यूजिक कम्पीटीशन और तालतला संगीत प्रतियोगिता शामिल हैं।
श्रीमती मुखर्जी आकाशवाणी और दूरदर्शन से शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन की अनुमोदित कलाकार हैं। वह भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद द्वारा शास्त्रीय गायन में शिक्षण एवं प्रदर्शन के लिए चयनित कलाकार हैं। वह देश भर में लगभग हर बड़े शहर में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम दे चुकी हैं।

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