देशभर में भाजपा के भगवा का अश्वमेध यज्ञ का अश्व दौड़ रहा है और केन्द्र में सत्ता पाने के बाद अब कुछ ही राज्य ऐसे बचे हैं जहां भाजपा अपनी सरकार बनाने में सफल नहीं हो पायी हे। अभी हाल में हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण, उत्तर प्रदेश था जहां पार्टी को उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है। भाजपा ने अपने दो सहयोगी दलों की मदद से विधान सभा की ४०३ सीटों में ३२५ पर कब्जा कर लिया है। इनमें ३१२ अकेले भाजपा के विधायक हैं। इसी प्रकार उत्तराखण्ड में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत से सरकार बनायी और सबसे खास बात यह कि गोवा व मणिपुर में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, फिर भी वहां भाजपा सरकार बनाने में सफल रही है। गोवा में भाजपा की पूर्व में भी सरकार थी लेकिन मणिपुर में भाजपा ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में जहां क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व हुआ करता था और उनके साथ कांग्रेस सरकार बना लेती थी, वहीं अब भाजपा ने पूर्वोत्तर के राज्यों में सरकार बनाने में सफलता पायी है। इसकी शुरूआत असोम (असम) से हुई है और अब मणिपुर में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व फुटबाल खिलाड़ी बीरेन सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने सदन में बहुमत भी साबित कर दिया है। मणिपुर में ६० सदस्यों वाली विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही थी और उसे २८ विधायक मिले थे। भाजपा को सिर्फ २१ विधायक मिल पाये थे। इसके बावजूद भाजपा का सरकार बनाकर बहुमत साबित करना पार्टी नेतृत्व की रणनीति की कुशलता माना जा रहा है।
मणिपुर में एक दशक से सत्ता पर कब्जा करने वाली कांग्रेस और उसके नेता इकोराम इबोबी सिंह के सामने २०१७ के विधान सभा चुनाव में दो तरफ से चुनौती मिली थी। पहली बार असोम के चुनाव जीत कर भाजपा ने पूरे दमखम से इस पूर्वोत्तर राज्य में भगवे को चुनाव मैदान में उतारा था तो दूसरी तरफ राज्य में लागू विशेष सशस्त्र बल अधिनियम के विरोध में लगातार १६ साल तक अनशन करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने अचानक अनशन तोड़कर राजनीतिक ताकत बनकर विरोध करना शुरू कर दिया। उन्होंने पहले यह प्रयास भी किया कि भाजपा के साथ मिलकर राजनीति के मैदान में उतरें लेकिन भाजपा इसके लिए तैयार नहीं हुई। इसलिए इरोम शर्मिला ने एक मोर्चा बनाया जिसका नाम पीपुल्स रिसोर्जेन्स एण्ड जस्टिस एलायंस रखा गया। इतना ही नहीं इरोम शर्मिला ने सीधे-सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री इकोराम इबोबी सिंह को ही चैलेन्ज करते हुए उसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ी जहां से इबोबी सिंह चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव के दौरान ही यह पता चल गया था कि इरोम शर्मिला को राज्य की जनता का भरपूर समर्थन नहीं मिल रहा है। उनके पास संसाधन तो थे ही नहीं और अब कोई भी चुनाव बिना संसाधनों, विशेष रूप से बिना पैसे के नहीं लड़ा जा सकता। कोई भी नेता यदि यह अपेक्षा करे कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तरह लोग उसके पीछे-पीछे दौड़ेंगे तो यह उसका दिवास्वप्न ही होगा। इरोम शर्मिला का भ्रम शायद अब टूट गया होगा क्योंकि ११ मार्च को जब अन्य राज्यों के साथ मणिपुर के चुनाव नतीजे भी घोषित हुए तो इरोम शर्मिला की पार्टी को एक भी विधायक नहीं मिल सका। इससे ज्यादा कठोर सत्य शर्मिला के लिए क्या हो सकता है कि उन्हें एक सौ समर्थक भी ऐसे नहीं मिले जो मतदाता बनकर उन्हें वोट देतें। राज्य की ६० सदस्यीय विधान सभा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे २८ विधायक मिले जबकि भाजपा २१ विधायकों के साथ दूसरे नंबर पर थी। कांग्रेस को पूर्ण बहुमत न मिलने पर यह तो साबित हो गया था कि वहां की जनता ने उसे ठुकराया है लेकिन जनता ने यह भी फैसला नहीं बताया कि वह किसे सत्ता सौंपना चाहती है। इसी असमंजस का फायदा भाजपा ने उठाया है।
भाजना ने मणिपुर में कांग्रेस छोड़कर पार्टी में आए पूर्व फुटबाल खिलाड़ी बीरेन सिंह को कमान सौंप दी। उन्होंने भाजपा के पक्ष में ३२ विधायकों को खड़ा कर दिया। विधान सभा चुनाव में नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) को चार सीटें, लोजपा को एक सीट एनपीपी को चार और निर्दलीय को एक सीट मिली है। बीरेन सिंह ने भाजपा के २१ विधायकों के साथ एनपीपी के चार विधायकों, तृणमूल कांग्रेस के एक विधायक और लोजपा के एक विधायक को भी अपने साथ शामिल कर लिया। इसमें से नगा पीपुल्स फ्रंट के चार विधायक भी उसके साथ हैं। बीरेन सिंह ने एक तरफ से इरोम शर्मिला और कांग्रेस को छोड़कर पूरे विपक्ष को एक कर दिया है। नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ), नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी), लोक जन शक्ति पार्टी (लोजपा), तृणमूल कांग्रेस को एक साथ भगवा के नीचे लाना भाजपा के किसी अन्य नेता के वश में नहीं था, इसीलिए कांग्रेस से आए बीरेन सिंह को मुख्य मंत्री बनाया गया। इरोम शर्मिला को भी अब अपनी भूल समझ में आयी है। वह कहती हैं कि राज्य के मतदाता धन-बल की राजनीति से सम्मोहित हो गये है। उन्हें अब राजनीति से परहेज होता दिख रहा हैं। कुछ दिनों के लिए वह केरल चली गयीं और कहती हैं कि अब चुनावी राजनीति नहीं करेंगी लेकिन देश भर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाने को लेकर लड़ाई जारी रखेंगी। इरोम शर्मिला ने जल्दी ही राजनीति से सबक ले लिया यह अच्छी बात है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में उनको देशभर में सम्मान मिल रहा था।
पूर्वोत्तर के इस राज्य में भाजपा एक बार भी सरकार नहीं बना सकी थी। यहां पर १९८० से अब तक हुए चुनावों में भाजपा सिर्फ तीन बार ही सीट हासिल कर सकी है, जो उसे वर्ष २०१२ के चुनाव में मिली थी। नौ मुख्यमंत्री कांग्रेस के ही रहे हैं। इस बार भी कांग्रेस ही सबके बड़ी पार्टी थी और सरकार बनाने में कैसे चूक गयी, इसपर उसे मंथन करना चाहिए। कांग्रेस के लिए इसबार नगाओं की नाराजगी भी भारी पड़ी है। नगाओं ने प्रदेश के नेशनल हाईवे पर पांच महीने से ज्यादा की अवधि तक नाके बंदी कर रखी थी। इससे राज्य में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति नहीं हो पायी। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने औपचारिकता जरूर निभाई लेकिन इस आर्थिक नाकेबंदी को खत्म करने में सफलता नहीं मिल सकी। इसीलिए अब कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के शपथ ग्रहण करते ही आर्थिक नाकेबंदी कैसे खत्म हो गयी? पिछले पांच महीने से राज्य में यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) के आह्वान पर आर्थिक नाकाबंदी चल रही थी। इस संदर्भ में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और नगा समूहों के बीच बातचीत हुई और १९ मार्च को आर्थिक नाकेबंदी खत्म कर दी गयी। इससे लगता है कि आर्थिक नाकेबंदी के पीछे भी कोई राजनीतिक कारण था।
बहरहाल, राजनीति की विडम्बना देखिए कि मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने और उसके नेता, तत्कालीन मुख्यमंत्री इकोराम इबोबी सिंह के चुनाव जीतने के बावजूद सरकार नहीं बना पायी जब कि गोवा में कांग्रेस से कम विधायक रखने वाली और उसके तत्कालीन मुख्यमंत्री लक्ष्मी कांत पारसेकर के चुनाव में पराजित होने के बाद भी भाजपा ने वहां भी सरकार बना ली है। दोनों सरकारों ने अपना-अपना बहुमत भी साबित कर दिया है। भाजपा के लिए मणिपुर की जीत और सरकार का बहुमत साबित करना गोवा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है और बताता है कि भाजपा पूर्वोत्तर राज्यों की भी पसंद बनती जा रही है। (हिफी)

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