समाज, राष्ट्र और राज्य के विकसित होने की पहचान शिक्षा से होती है। शिक्षा ही व्यक्ति के आन्तरिक व्यक्तित्व का विकास करती है। उत्तर प्रदेश में महंत आदित्य नाथ योगी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे? शिक्षा को गुणवत्ता परक बनाया जाएगा और उसे रोजगार से जोड़ा जा सकेगा? विधान सभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपना संकल्प पत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि उत्तर प्रदेश शिक्षा एवं सांस्कृतिक विषयों में हमेशा अग्रणी राज्य रहा है लेकिन समाजवादी पार्टी और बसपा के शासन काल में शिक्षा क्षेत्र की उपेक्षा हुई।
इसके कारण शैक्षिक गुणवत्ता का पतन हुआ। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में बालिका शिक्षा को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने का वादा किया है। सभी लड़कियों को अहिल्या बाई कन्या निशुल्क शिक्षा योजना के अन्तर्गत स्नातक स्तर तक नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की जाएगी। सभी लड़कों के लिए भी कक्षा १२ तक और कक्षा १२ में ५० फीसद से अधिक अंक पाने पर स्नातक स्तर तक नि:शुल्क शिक्षा मिलेगी। परीक्षा में अंकों का मापदण्ड आते ही नकल की बात सामने आती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा की ही सरकार ने नकल अध्यादेश लाकर नकल की समस्या को जड़ मूल से खत्म करने का प्रयास किया था। इस बार उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव सभाओं में नकल के प्रति चिंता जतायी थी और कहा था कि यहां तो नकल के सेंटर ही खुले हैं। इसके साथ ही शिक्षा में संस्कार लाने और उसे रोजगार से जोडऩे की भी जरूरत है। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही नकल करने वाले छात्र-छात्राओं में भय तो देखा जा रहा है। लगभग डेढ़ लाख परीक्षार्थियों ने परीक्षा ही छोड़ दी है और कई परीक्षा केन्द्रों को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया है।
परीक्षा में नकल की समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि उसे इतनी आसानी से समाप्त भी नहीं किया जा सकता लेकिन नकलचियों और नकल कराने वाले माफियाओं में यदि भय पैदा हुआ है तो उम्मीद की जा सकती है कि यह सरकार इस पर प्रभावी अंकुश लगाएगी। मजे की बात यह है कि भाजपा के चुनावी संकल्प पत्र में नकल के लिए कोई बात नहीं कही गयी लेकिन चुनावी भाषणों में इसका उल्लेख किया गया है। इस मामले को शायद गुण्डाराज और भ्रष्टाचार से ही जोड़ दिया गया है। क्योंकि नकल कराने वाले माफिया अपना आतंक कायम किये हुए हैं। प्रदेश की राजधानी से सटे एक शिक्षा केन्द्र के बारे में यही शिकायत मिली थी कि वहां बच्चों का प्रवेश ही इस शर्त पर होता है कि उसे परीक्षा में अच्छे अंक मिलेंगे। इस प्रकार के विद्यालय रसूखदारों, नेताओं और अफसरों के हैं। इसलिए शिक्षा विभाग के अधिकारी उनपर हाथ भी नहीं डाल पाते। सबसे बड़ी ढि़लाई राज्य सरकार की ही होती है। शिक्षा माफिया राजनीतिक दल से सम्पर्क रखते हैं इसलिए वे अपनी मन मानी करते रहते हैं। प्रदेश में आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री बनने का खौफ अनियमितता करने वालों पर साफ दिखाई देने लगा है। हाईस्कूल-इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में गणित का प्रश्न पत्र बहुत कठिन माना जाता है और इसमें मेहनत करने वालों को अंक भी बहुत अच्छे मिलते है। इस बार बताया जा रहा है कि एक लाख परीक्षार्थियों ने गणित की परीक्षा ही छोड़ दी है। परीक्षा में सख्ती के बावजूद नकल होने की शिकायतें भी प्राप्त हो रही हैं। गणित की परीक्षा के दौरान पूरे प्रदेश में सौ नकलची पकड़े भी गये। हाई स्कूल में परीक्षा छोडऩे वालों की संख्या तीन लाख के करीब हो गयी है।
इस प्रकार, अभी तो नहीं कहा जा सकता कि इस साल की बोर्ड परीक्षा में शुचिता कायम होगी लेकिन भविष्य के लिए ऐसी उम्मीद की जा सकती है। नकल माफियाओं में भय पैदा हो जाए और शिक्षा प्रशासन बेखौफ होकर अपना कार्य करने लगे तो नकल जैसी समस्या पर भी अंकुश लगाया। जा सकेगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार दूर करने का इरादा जताया है। यह कदम भी परीक्षा के स्तर से ही तय करना पड़ेगा और नि:शुल्क शिक्षा देने की बात भी तभी सार्थक होगी जब परीक्षा में मेहनत करने वाले परीक्षार्थी ही अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे। उत्तर प्रदेश में परीक्षाओं को मखौल बना दिया गया था और ९९-८ प्रतिशत तक अंक परीक्षार्थियों को मिलने लगे थे। प्रतिभाशाली छात्रों की बात अलग है लेकिन जिस तरह से छात्र-छात्राओं की फौज मेरिटोरिअस की लाइन में खड़ी हो रही है, उससे संदेह होना स्वाभाविक है। इस बार यूपी बोर्ड की परीक्षाएं जब शुरू हुईं तो प्रदेश में सरकार बनने की प्रक्रिया चल रही थी। इसके चलते स्कूलों में फोर्स की कमी हो सकती है और स्कूल के प्रबंधकों को नकल माफियाओं पर नियंत्रण करना कठिन हो सकता है। यही कारण रहा कि मथुरा के एक इंटर कालेज में नकल माफियाओं ने स्कूल के कक्ष की खिड़की ही तोड़ डाली ताकि नकल करायी जा सके। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए नकल पर रोक लगाने की व्यवस्था अगले साल से करनी होगी।
इसी नकल से जुड़ी है शिक्षा में गुणवत्ता की जरूरत। शिक्षा को यदि गुणवत्ता वाला बना दिया जाए और संस्कारों की शिक्षा दी जाए तो नकल की संभावना भी अपने आप कम हो जाएगी। पहले शिक्षा में गुणवत्ता हुआ करती थी। बच्चे मन लगाकर पढ़ते थे और नकल नहीं करते थे। नकल की जब समस्या खड़ी हुई तो शिक्षा विदो ने पाठ्यक्रम में बदलाव करने का प्रयास किया और प्रश्नों को इसतरह से बनाने का प्रयास किया कि बच्चा उसी में उलझा रहे और नकल न कर सके। इसकी जगह शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में संस्कार पैदा करने का प्रयास किया जाता तो स्कूलों का वातावरण इतना प्रदूषित न हुआ होता।
उत्तर प्रदेश के लिए भाजपा ने इस प्रकार की कार्ययोजना बनायी है। स्कूलों में संस्कृत शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही गयी है। प्राथमिक शिक्षा से ही योग शिक्षकों को शारीरिक शिक्षक के पद पर तैनात किया जाएगा। प्रदेश में संस्कृत अकादमी को बढ़ावा देने का प्रयास होगा और महामना पंडित मदन मोहन मालवीय संस्कृत विश्व विद्यालय की स्थापना की जाएगी। प्रदेश में प्राइमरी स्तर पर शिक्षकों की बड़ी संख्या में कमी है। इसके लिए पूर्व की सरकार ने शिक्षा मित्रों की तैनाती कर रखी है। शिक्षा मित्रों के मामले में भाई-भतीजावाद भी खूब चला और यह नहीं देखा गया कि जिन्हें शिक्षा मित्र बनाया गया है, उनकी रूचि अध्यापन में है अथवा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिए शिक्षा मित्रों को पूर्णकालिक शिक्षक बनाने पर आपत्ति की और कहाकि प्रदेश के नौनिहालों का भविष्य अप्रशिक्षित लोगों के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता। प्राइमरी स्कूल के बच्चे अनगढ़ मिट्टी के समान होते हैं, उनकी बनावट प्राइमरी शिक्षा से ही तय होती है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में वादा किया है कि शिक्षामित्रों की रोजगार समस्या तीन महीने में न्यायोचित तरीके से सुलझा दी जाएगी। आदित्य नाथ योगी सरकार को किसानों के कर्जे माफ करने, भ्रष्टाचार दूर करने, गुण्डाराज समाप्त तरने आदि के साथ ही राज्य की प्राइमरी शिक्षा पर सबसे पहले ध्यान देना होगा।

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