सहज शब्दों में जज्बात की बयानगी ने दी शायरी को रवानगी

लखनऊ। सहज सरल शब्दों में शायरी करना निदा फाजली की खासियत थी। वे खालिस भारतीय और पक्के देशभक्त थे। मंच पर उनका विराट व्यक्तित्व था तो पत्र-पत्रिकाओं में नज्मों के साथ ही गम्भीर लेखों ने उन्हें चिंतनशील विचारक की पहचान दिलाई। बेहतरीन शायरी के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा।

हिन्दी-उर्दू साहित्य अवार्ड कमेटी की ओर से ये विचार यहां प्रेस क्लब में निदा फाजली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आयोजित संगोष्ठी में विद्वानों ने व्यक्त किए। यहां अमेरिका, कनाडा, मिस्र, दुबई के विद्वान भी लेख पढ़ने के लिए आमंत्रित थे। अध्यक्षीय वक्तव्य में डा.शारिब रुदौलवी ने कहा कि जज्बात को आसान हर्फों में बयां करने की पकड़ निदा की खासियत थी। ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’ जैसे शेर उनके जैसा शायर ही लिख सकता है। ऐसी शायरी मिटाने की हजार कोशिशों के बावजूद नहीं मिट सकती।

डा.साबरा हबीब के संचालन में चली संगोष्ठी में इससे पहले कमेटी के महासचिव अतहर नबी ने अतिथियों और वक्ताओं का स्वागत करते हुए कमेटी की गतिविधियों से परिचित कराया और कहा कि कमेटी निदा फाजली के व्यक्तित्व और कृतित्व को जल्द ही किताब की शक्ल में ढालकर लाने का प्रयत्न करेगी। शायर हसन कमाल ने कहा कि निदा फाजली को आम आदमी भले ही उनको ‘दुनिया जिसे कहते हैं, मिट्टी का खिलौना है’, ‘होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है’, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता….’ जैसे गीतों से पहचानता हो पर उनकी गज़लें कड़वी सच्चाईयों से निकली और जिंदगी का पूरा फलसफा सामने रखने वाली हैं। उर्दू-फारसी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा.अनीस अंसारी ने उन्हें एक सुलझा हुआ शायर बताने के साथ कहा कि दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता जरूर पाकिस्तान जाकर बस गए थे मगर वे नहीं गए। उनकी शायरी बहुत बेतकल्लुफ और ऐसे चुनिंदा शब्दों में है कि जहां कोई और शब्द उतना सटीक नहीं हो सकता। डा.अब्बास नय्यर ने उनके साहित्यिक सफर का जिक्र करते हुए बताया कि उनका जन्म 1938 में 12 अक्तूबर दिल्ली में हुआ और उनका असल नाम मुक्तदा हसन था। भावों को पढ़ने का शायराना अंदाज उनको विरासत में मिला था। पिता मुर्तुजा हसन खुद शायर थे। बचपन में वह जांनिसार खां अख्तर के शहर ग्वालियर में रहे। वहीं से पीजी किया। शायर जांनिसार अख्तर उनकी शायरी से प्रभावित थे और अख्तर के इंतकाल के बाद उनकी बदौलत ही उन्हें कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुल्तान में गीत लिखने का मौका मिला। ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है….और आई जंजीर की झन्कार….’ जैसे गीत सामने आते ही हर जुबान पर आम हो गए। फैयाज रिफअत ने बताया कि उस समय मुंबई हिन्दी-उर्दू साहित्य का केन्द्र माना जाता था। वहाँ से धर्मयुग, सारिका जैसी प्रतिष्ठित लोकप्रिय पत्रिकाएँ निकलती थीं। निदा काम की तलाश में वहाँ गए और धर्मयुग, ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं व समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे। उनकी सरल और प्रभावकारी लेखनशैली ने उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई। उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह 1969 में शाया हुआ। फिर फिल्मी सफर शुरू हुआ। डा.निर्मल दर्शन ने बताया कि निदा फाजली को आसान भाषा में लिखे दोहों के लिए खास तौर पर याद किया जाएगा। उनके दोहों और गजलों को जगजीत सिंह की आवाज ने चार चांद लगाकर और लोकप्रिय बनाया। अमेरिका के जैक्सन अलेक्स, ने बताया कि निदा फाजली ने कबीरदास, तुलसीदास, बाबा फरीद इत्यादि कई अन्य कवियों को पढ़ा और गुना। तभी उन्होंने सीधे दो-टूक भाषा को चुना। आठ फरवरी 2016 को निधन हो गया। संगोष्ठी में इसके अलावा दुबई के डा.अल्तमश, मिस्र के गलाल इटेवाफी, कनाडा के डा.इकबाल हैदर, डा.शाकिर हाशमी, डा.अनवर जलालपुरी, शायर मनीष शुक्ला, शाहनवाज कुरैशी, सुहैल काकोरवी, सिराज मेंहदी, हसन काजमी, डा.मसीहुद्दीन, डा.सुधीर मिश्रा, संतोष बाल्मीकि व डा.साबिहा अनवर ने भी विचार रखे।

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