लखनऊ। स्वप्निल संसार। समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने से पहले भाजपा ने जो वादे किए थे, उनको तो उसने भुला ही दिया, समाजवादी सरकार ने जनहित के जो काम शुरू किए थे उनको भी मिटाने में लग गई है। शिक्षा, स्वास्थ्य के बाद अब बिजली की व्यवस्था भी पटरी से उतर गई है। शहरों से लेकर गांवों तक जबर्दस्त आपात कटौती का दौर चल रहा है। किसान बेहाल है। राज्य सरकार जनता की परेशानियों के प्रति संवेदन शून्य है। 

उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग 20,000 मेगावाट से अधिक हो गयी है जबकि बिजली की कुल उपलब्धता 16500 मेगावाट है। परिणाम स्वरूप लगभग 3500 मेगावाट बिजली की कटौती हो रही हैं। मिलियन यूनिट में बात करें तो कुल मांग 411 मिलियन यूनिट है। जबकि बिजली की उपलब्धता 390 मिलियन यूनिट है अर्थात 21 मिलियन यूनिट तक बिजली कटौती हो रही है जिससे सरकार के जिला स्तर तक 24 घंटे और तहसील और गांव तक 20 घंटे बिजली देने के दावे पूरी तरह गलत साबित हो रहे हैं।
वर्तमान में प्रदेश के ताप बिजली घरों से 3293 मेगावाट, जल विद्युत गृहों से 288 मेगावाट, प्रदेश के निजी क्षेत्र के बिजली घरों से 4854 मेगावाट और केंद्र तथा प्रदेश के बाहर के अन्य संसाधनों से 8336 मेगावाट बिजली मिल रही है जो कुल 16771 मेगावाट है जबकि मांग 20,000 मेगावाट से अधिक है। अतः ऊर्जा मंत्री का यह कहना पूरी तरह असत्य और भ्रामक है कि बिजली की कोई कमी नहीं है।
सच तो यह है कि विगत अक्टूबर में समाजवादी पार्टी सरकार ने केंद्र से पहल कर प्रदेश के बाहर से बिजली लाने की कुल पारेषण क्षमता को 6 हजार मेगावाट से बढ़वाकर 7200 मेगावाट करवा दिया था और 8 हजार मेगावाट क्षमता करवाने की पहल शुरू कर दी थी जो मई 2017 में 8 हजार मेगावाट हो गयी है। अब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार है अतः अनर्गल बयानबाजी के बजाय डबल इंजन की सरकारें कुल पारेषण क्षमता कम से कम 12 हजार मेगावाट करनी चाहिए जिससे प्रदेश के बाहर से उपलब्ध सस्ती बिजली को प्रदेश में लाया जा सके।
जबकि अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार के समय गांवों को 18 घंटे और महानगरों को 24 घंटे बिजली मिल रही थी। वहीं अब गांवों में 8 घंटे और शहीरों में 10 घंटे बिजली मिल रही है। राजधानी लखनऊ में भी अघोषित कटौती हो रही है।
अब बिजली दरों में बढ़ोत्तरी की भी साजिशें शुरू हो गई है। इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में सूखा से निबटने में किसानों के सामने सिंचाई का संकट पैदा हुआ है। भाजपा राज में किसानों को तो वैसे भी उपेक्षित रहना है। समाजवादी सरकार में किसानों को सरकारी ट्यूबवेल से मुफ्त सिंचाई की सुविधा उपलब्ध थी। इसलिए किसान आज भी अखिलेश यादव को याद करते हैं।
भाजपा की मार गरीबों और सामान्य आदमी पर ही पड़ती है। बड़े बिजली चोरों को भाजपा नेताओं का अभयदान प्राप्त है। अब बिजली की दरें बढ़ाने की भी कवायद चल रही है। बिजली दरें बढ़ाने के निर्णय से पहले नोटबंदी और जीएसटी के कारण मंहगाई की मार झेल रहे उपभोक्ताओं की हालत और ज्यादा खराब हो जाएगी। अच्छे दिनों की शायद भाजपा कोष में यही परिभाषा है।

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