एम्बुलेंस को अपनी कार समझ लिया

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नशा करना अच्छी बात नहीं है। इसके चलते आदमी अपने होशो हवास खो बैठता है। कई बार आपराधिक गतिविधि मैं भी वह संलग्न हो जाता है। इसीलिए नशे से दूर रहने की सलाह दी जाती है। तमिलनाडु में इसी तरह नशे में धुत एक व्यक्ति अपनी कार के धोखे में एम्बुलेंस को लेकर ही घर पहुंच गया। उसकी इस हरकत से अस्पताल में गंभीर मरीजों को कितनी परेशानी हुई होगी, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है।
चेन्नई पुलिस ने इस नशेबाज की हरकत के बारे में बताया है। पुलिस के अनुसार नशे में धुत एक व्यक्ति इस तरह अपने होश खो बैठा कि अपनी आॅडी कार को छोड़कर इसी के पास खड़ी एम्बुलेंस लेकर घर चला गया। यह घटना गत 17 दिसम्बर 2017 की है। एक व्यवसायी सुबह अपने घायल दोस्त को अस्पताल लेकर गया था। दोस्त को अस्पताल में भर्ती कराकर वह बाहर आया। उस समय वह नशे में धुत था। उसने अस्पताल के पास ही एम्बुलेंस देखी जिसमें चाबी लगी हुई थी। व्यापारी ने उस एम्बुलेंस को अपनी कार समझ कर स्टार्ट किया और घर पहुंचा। उधर, अस्पताल में एम्बुलेंस की जरूरत पड़ने पर उसकी तलाश हुई। मरीजों को बड़े अस्पताल में भेजना था लेकिन वहां एम्बुलेंस नहीं थी।
इधर, वह व्यापारी एम्बुलेंस लेकर जब अपने घर पहुंचा तो उसके परिवार वाले भी हैरान रह गये। अस्पताल से लगभग 15 कि.मी. दूर उसका घर था। घरवालों ने पूछा कि तुम्हारी कार कहां है? तब उस व्यापारी को अपनी गलती का अहसास हुआ। कारोबारी ने अस्पताल की एम्बुलेंस अस्पताल पहुंचाई और अपनी कार वहां से ले आया। उसने अपनी इस भूल के लिए अस्पताल प्रशासन से माफी भी मांगी। (हिफी)
बदहाल करोड़पति
यह बात सुनने में अजीब लगती है कि कोई करोड़पति होते हुए भी पागलों जैसा बदहाल घूम रहा हो क्योंकि लक्ष्मी में बड़े गुण होते हैं। संस्कृत में एक श्लोक भी है कि जिसके पास लक्ष्मी है, वह कुलीन हो जाता है, उसके पास ज्ञान का भंडार पहुंच जाता है, लोग उसे विद्वान कहते हैं अर्थात सभी गुण कंचन (सोना) के आश्रित रहते हैं। यह सच्चाई है लेकिन नियति और विधि का विधान भी कुछ होता है। ऐसी ही नियति तमिलनाडु के एक बुजुर्ग की देखी गयी जो करोड़पति होते हुए भी उत्तर प्रदेश के रायबरेली के लालगंज कस्बे में किसी तरह भटकता हुआ पहुंच गया और बदहाल घूम रहा था।
उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में एक छोटा कस्बा है लालगंज। लालगंज में 13 दिसम्बर से एक बुजुर्ग को बदहाल घूमते देखा गया। कुछ लोग तो उसे भिखारी बताते थे हालांकि उस बुजुर्ग ने कभी किसी से कुछ भी नहीं गांगा। कोई अगर प्यार से कुछ खिला-पिला देता था तो वह खा-पी लेता था। इस बदहाल बुजुर्ग पर स्वामी सूर्य प्रबोध परमहंस इंटर कालेज अनंगपुरम, रत्नपुर के संस्थापक स्वामी भास्कर स्वरूप की नजर पड़ी। वह बुजुर्ग को अपने घर ले गये और वहीं रहने का आग्रह किया। बुजुर्ग भी सज्जन व्यक्ति को देखकर उनके यहां रहने लगा।
कुछ समय के बाद स्वामी भास्कर स्वरूप को पता चला कि वह भिखारी नहीं बल्कि करोड़पति व्यक्ति है। उसका नाम मुथइया नादर है और उम्र 72 वर्ष की हैं। उस बुजुर्ग के पास उसी के नाम की एक करोड़, छह लाख 92 हजार के फिक्स डिपाजिट की बैंक रसीद मिली थी। इसके साथ ही बुजुर्ग के पास आधार कार्ड भी था, जिससे उनका नाम, उम्र और घर का पता भी लग गया। तमिलनाडु के थिंदियेर तिरूनेल वेल्ली के रहने वाले उस बुजुर्ग के परिजनों को स्वामी भास्कर स्वरूप ने खबर भेजी। उन्होंने पुलिस को इसका माध्यम बनाया। बुजुर्ग के परिजन आये और हवाई जहाज पर बैठाकर तमिलनाडु ले गये। बदहाली में बिताये चंद दिन शायद उनकी नियति में लिखे थे। (हिफी)
अटूट स्नेह का बंधन
कुछ चीजें दिखाई नहीं पड़तीं लेकिन उनका अनुभव होता है। प्यार और स्नेह का बंधन भी ऐसा ही है जो भौतिक रूप से नहीं दिखता लेकिन इतना अटूट होता है कि जीवन भर नहीं टूटता। प्यार और स्नेह का बंधन इंसानों के बीच ही नहीं पशु-पक्षियों के बीच भी होता है और इंसानों के बीच भी। इतना ही नहीं इंसानों और पशु-पक्षियों में यह बंधन देखा गया है। ऐसा ही एक बंधन पिता-पुत्र के बीच था जिन्होंने एक-दूसरे के लिए प्राण त्याग दिये और पिता-पुत्र के स्नेह को अमर कर दिया।
यह कहानी नहीं सच्ची घटना है। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में एक गांव है सोरांव। इसी गांव में 52 वर्षीय रामभजन रहा करते थे। उनका बेटा था अमरनाथ। उसकी उम्र 30 वर्ष थी और उसे किडनी की बीमारी हो गयी। रामभजन ने अपने बेटे अमरनाथ का पहले स्थानीय स्तर पर इलाज कराया लेकिन वहां फायदा न होने पर वह उसे प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक अस्पताल में ले आये। बेटे की हालत सुधरने की जगह बिगड़ती ही चली गयी। किडनी की बीमारी से पीड़ित बेटे की हालत देखकर पिता राम भजन की तबियत खराब हो गयी। प्राइवेट अस्पताल के डाक्टरों ने पुत्र के बिस्तर के पास ही पिता को भी भर्ती कर लिया। पिता का उपचार चल ही रहा था कि पिता ने दम तोड़ दिया। परिवार के लोग रामभजन का शव लेकर घर जा रहे थे। वे त्रिवेदी गंज के पास पहुंचे ही थे कि उन्हें सूचना मिली कि उनके बेटे अमरनाथ की भी मौत हो गयी है। शोकाकुल लोग पिता-पुत्र के स्नेह की चर्चा कर रहे थे।
स्नेह के अटूट बंधन का यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। अक्सर इस प्रकार की घटनाएं सुनने को मिलती रहती है। प्यार और स्नेह सचमुच ऐसा ही होता है जो एक बार जुड़ता है तो फिर टूटता नहीं है। प्यार और स्नेह में कभी भी स्वार्थ नहीं रहता है और स्वार्थ है तो उसे प्यार और स्नेह नहीं कहेंगे। हम भी किसी से प्यार और स्नेह करें तो निस्वार्थ भाव से करें हमारे इस स्नेह बंधन को हमारे न रहने के बाद भी लोग याद करेंगे जिस तरह अमेठी के रामभजन और अमरनाथ के स्नेह की लोग चर्चा कर रहे हैं। (हिफी)

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