नवरात्र पर विशेष- भारतीय संस्कृति में माना गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा जी ने की और जिस दिन उन्होंने इस महान कार्य को सम्पन्न किया, वह चैत्र महीने में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा थी। वर्षा नक्षत्रों के आधार पर महीनों के नाम रखे गये और ग्रहों की दशा को भी देखा गया। ब्रह्मा जी की यह सृष्टि इसीलिए बहुत दिनों तक बनी रहती है। इस अवधि को हम युगों के माध्यम से मानते हैं और महाराजा विक्रमादित्य ने इसी दिन से सम्वत की शुरुआत की थी। वर्ष की शुरुआत में आदि शक्ति माँ दुर्गा की उपासना की जाती है। माँ के नौ स्वरूप बताये गये हैं। इनमें पहला स्वरूप माँ शैलपुत्री का होता है। नवरात्र के प्रारम्भ में कलश स्थापना करके माँ का आह्वान किया जाता है। इसके पश्चात माँ को स्नान कराकर वस्त्र-आभूषण पहनाए जाते हैं और नौ दिनों तक उनकी आराधना की जाती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। माँ को मौसम के अनुसार फल-फूल अर्पित करते हुए घर-परिवार, समाज, देश और सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
नवरात्र के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की आराधना होती है जो हिमाचल की पुत्री हैं और भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इनकी आराधना के बीज मंत्र हैं हृीं शिवायै नम: इसके साथ ही श्रद्धालु ऊँ ऐं हृीं क्लीं शैलपुन्न्यै नम: का जाप भी करते हैं। इसी प्रकार दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है जिनका बीज मंत्र है हृीं अम्बिकायै नम:। इसके साथ ही श्रद्धालू ऊँ हृीं क्लीं ब्रह्ममचारिण्यै नम: का जप करते हुए माँ से कल्याण की प्रार्थना करते हैं। (हिफी)

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