स्मृति शेष । लखनऊ। स्वप्निल संसार।एजेंसी । ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’- नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह नारा आज भी युवाओं के दिल पर छपा हुआ है। उनकी बातें जब आज की पीढ़ियों में इतना जोश भरती हैं तो जरा सोचिए, उस वक़्त क्या आलम रहा होगा जब वह आज़ाद हिन्द सेना का संचालन किया करते थे। बोस और उनकी आज़ाद हिन्द सेना ने ब्रिटिश सरकार की नींदे उड़ाई हुई थीं और यह सब संभव हो पाया था नेताजी के उन बेबाक और वफादार सिपाहियों की वजह से, जो उनके लिए अपनी जान भी देने को तैयार थे।
ब्रिटिश सरकार हर हाल में नेताजी को पकड़ना चाहती थी और इसलिए जैसे ही उन्हें नेताजी के ठिकाने की खबर पड़ती, वो हमला बोल देते। एक बार बर्मा के जंगलों में ब्रिटिश सैनिकों ने सुभाष चंद्र बोस पर छिपकर वार किया, लेकिन वह उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए। क्योंकि उस समय नेताजी पर चली गोलियां एक सच्चे देशभक्त निज़ामुद्दीन ने अपने सीने पर ले ली थीं।
निज़ामुद्दीन का वास्तविक नाम सैफुद्दीन था और उनका जन्म  1901 में धक्वान गाँव (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में स्थित) में हुआ था। 20 साल की उम्र में वह घर से भागकर ब्रिटिश सेना में शामिल होने के लिए पहुँच गए। लेकिन यहाँ एक दिन उन्होंने एक ब्रिटिश अधिकारी को कहते सुना कि भारतीय सैनिकों को बचाने से ज़्यादा ज़रूरी उन गधों को बचाना है, जिन पर लाद कर बाकी सेना के लिए राशन पहुँचाया जाता है। वह अपने साथियों के लिए ऐसी निर्मम और कटु बातें बर्दाश्त न कर पाए और उन्होंने वहीं उस ब्रिटिश अधिकारी पर गोली चला दी।
यहाँ से भागकर वह सिंगापुर पहुंचे और नेताजी की सेना में शामिल हो गए और अपना नाम रख लिया ‘निज़ामुद्दीन।’ वह नेताजी की कार के ड्राईवर थे, जो उन्हें मलय के राजा ने उपहार में दी थी।  1943 से 1944 तक, उन्होंने नेताजी के साथ बर्मा (वर्तमान में म्यांमार) के जंगलों में ब्रिटिश सेना के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “हम जंगल में थे और अचानक मैंने झाड़ियों के बीच से बन्दूक की नली देखी और मैं तुरंत नेताजी के सामने कूद गया। तीन गोलियाँ लगने के बाद, मैं बेहोश हो गया और जब होश आया, तो नेताजी मेरी बगल में खड़े थे। कप्तान लक्ष्मी सहगल ने मेरे शरीर से गोलियाँ निकालीं। यह  1943 की बात है।”
इस घटना के बाद ही नेताजी ने उन्हें ‘कर्नल’ की उपाधि दी थी। उन्होंने कई यात्राओं में नेताजी का साथ दिया और आज़ाद हिन्द फौज के भंग होने तक साये की तरह उनके साथ चले। बाद में, उन्होंने रंगून के एक बैंक में ड्राइवर की नौकरी कर ली। वह और उनका परिवार 1969 में अपने गाँव लौटे। यहाँ उन्होंने अपने घर का नाम ‘हिन्द भवन’ रखा और आज भी उनके घर की छत पर तिरंगा लहराता है। वह लोगों का अभिवादन भी ‘जय हिन्द’ कह कर करते थे, जैसा कि आज़ाद हिन्द फ़ौज में नियम था। वैसे भी कहते हैं न कि ‘पुरानी आदतें जल्दी नहीं छूटती!’ 6 फरवरी 2017  को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

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