श्री श्री परमहंस योगानन्दजी गोरखपुर में जन्मे परमहंस योगानन्द बीसवीं सदी के  आध्यात्मिक गुरू, योगी और संत थे। परमहंस योगानन्द जी का जन्म 5 जनवरी, 1893 को  बंगाली परिवार में गोरखपुर में हुआ। माता-पिता ने उनका नाम मुकुन्द लाल घोष रखा। जन्म के कुछ समय पश्चात् उनकी माताश्री उन्हे अपने गुरु श्री श्री लाहिडी महाशय के आर्शीवाद के लिए वाराणसी ले गई । महान गुरु ने उनकी माताश्री से कहा ‘छोटी माँ, तुम्हारा पुत्र एक योगी होगा। एक आध्यात्मिक इंजन की तरह वह अनेकानेक लोगों को र्इश्वर के अधिराज्य में ले जायेगा।’’ योगानन्द जी में जन्म से ही ईश्वर-प्राप्ति की परम आकांक्षा बनी हुई  थी। परमसत्य की खोज के क्रम में वे अपने गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि जी के पास पहुँचे।  1915 में 10 वर्षों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण के बाद के योगानन्द जी ने संन्यास का स्वामी पद ग्रहण किया।बालक मुकुन्द (परमहंस योगानन्द) ने अपने बाल अवस्था से ही गेरूए कपड़े अपने आप पहनना शुरू कर दिया था। जब उनकी क्लास के दूसरे बच्चे परीक्षा की तैयारी कर रहे होते तो वह चुपचाप दिन में और रात में श्मशान में जाकर घंटों बैठे रहते। इतनी कम उम्र में जलती चिताओं के बीच बैठे रहने के बाद भी उनको जरा सा भी डर नहीं लगता था।परमहंस योगानन्द भविष्य में योगी बनेंगे। ये बात उनके परिवार के लोग जानते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि किसी तरह उनको योगी बनने के रास्ते से रोका जाए। इसके लिए उनके परिजनों ने भरसक प्रयास भी किया, लेकिन उनके सारे प्रयास बेकार साबित हुए। इसी के चलते वह एक बार घर से भाग भी गए थे। तब उनके बड़े भाई उन्हें वापस घर लेकर आए थे। योगानंद किसी काम से बाजार जा रहे थे। जैसे ही वह अपने निवास स्थान से निकले, उन्हें कुछ दूरी पर तिकोनी दाड़ी वाले गेरूआ कपड़े पहने हुए एक संत दिखाई दिए। योगानंद के आश्चर्य की सीमा न रही, ये संत बिलकुल वैसे ही थे, जो उन्हें प्राय: हर रात सपने में दिखाई देते थे। योगानंद दौड़कर उनके पास पहुंच गए। ये कोई और नहीं बल्कि लाहिड़ी महाराज के शिष्य युक्तेश्वर गिरीजी थे। उन्होंने योगानंद से बंगाली भाषा में कहा कि ‘तुम आ गए मुकुन्द’, ‘मैं तुम्हारी कितने सालों से प्रतीक्षा कर रहा था।’ इसके बाद वह योगानन्द का हाथ पकड़कर काशी के राणामहल इलाके में अपने डेरे में ले गए।
उन्होंने अपने अनुयायियों को क्रिया योग का उपदेश दिया तथा पूरे विश्व में उसका प्रचार तथा प्रसार किया। योगानंद के अनुसार क्रिया योग ईश्वर से साक्षात्कार की एक प्रभावी विधि है, जिसके पालन से अपने जीवन को संवारा और ईश्वर की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है।
उनकी उत्कृष्ट आध्यात्मिक कृति योगी कथामृत (An Autobiography of a Yogi) की लाखों प्रतिया बिकीं हैं।परमहंस योगानन्द के जीवन एवं उनकी शिक्षाओं का वर्णन उनकी आत्मकथा ‘योगी कथामृत’ में उपलब्ध है, कोलकाता विश्वविद्यालय के स्नातक श्री योगानन्दजी का यह ग्रन्थ अविस्मरणीय निष्ठा, प्रखर ज्ञान और दैवी उत्साह से भरपूर है। उनकी यह पुस्तक एक उत्कृष्ट ग्रन्थ सिद्ध हुई  और 21 भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है। जो 1946 में उसके प्रकाशन के बाद आध्यात्मिक क्षेत्र में गौरव ग्रन्थ बन गयी है तथा अब विश्व तथा भारत भर में कई महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पाठ्य-पुस्तक तथा सन्द्र्भ-ग्रन्थ के रूप में प्रयोग में लायी जा रही है।
कहा जाता है कि एक ईश्वर-प्राप्त योगी अपने भौतिक शरीर का आकस्मिक रूप से त्याग नहीं करता। उनको पृथ्वी से अपने महाप्रयाण के समय का पूर्व ज्ञान होता है। अपने अंतिम वर्षों से परमहंस जी ने अंतरंग शिष्यों को कई संकेत दिये कि वे मार्च 1952 में शरीर छोड़ देंगे।

7 मार्च, 1952 को भारतीय राजदूत विनय रंजन सेन के सम्मान में आयोजित भोज के अवसर पर भाषण के लिए परमहंस योगानन्द जी को आमंत्रित किया गया था। महान गुरु पूरी तरह से स्वस्थ प्रतीत हो रहे थे। उनका भाषण संक्षिप्त था। पूरे सभागार में एक गहरी शान्ति छा गई । ऐसा लगता था जैसे पूरी सभा महान गुरु के शान्ति तथा पे्रेम के अपूर्व सपंदनों के प्रभाव में थी। उन्होंने अपने भाषण को अपनी कविता ‘मेरा भारत’ की कुछ पंक्तियों से समापन किया : ‘जहाँ गंगा, वन, हिमालय की गुफायें और जहाँ मानव ईश्वर-चिन्तन में डुबा हुआ’…. और इन शब्दों के साथ परमहंस जी परम जी परम शान्ति में विलिन हो गये : उनके चेहरे पर एक मोहक मुस्कान थी।
परमहंस योगानन्द जी ने जीवन में ही नहीं वरन मृत्यु में भी सिद्ध कर दिया कि वे महान योगी थे। उनके देहावसान के कई सप्ताह बाद भी उनका अपरिवर्तित चेहरा अक्षयता की दिव्य कान्ति से देदीप्यमान था। फॉरेस्ट लॉन मेमोरियल-पार्क लॉस ऐंजेलिस (जहां महान् गुरु का पार्थिव शरीर अस्थायी रूप से रखा गया है) के निदेशक हैरी टी रौवे ने सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप को  प्रमाणित पत्र भेजा था, जिसके कुछ अंश इस प्रकार है : ‘शवागर के इतिहास में जहाँ तक विदित है, पार्थिव शरीर के ऐसे परिपूर्ण संरक्षण की यह अवस्था अद्वितीय है।’एजेन्सी। 

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