जयंती
शहीद कैप्टन मनोज कुमार पांडे, परमवीर चक्र विजेता, मात्र 24 साल की उम्र में ही देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर गए। लेकिन अपनी शहादत से पहले वो करगिल जंग की जीत की बुनियाद रख चुके थे। 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमन और भाईचारे की बस लेकर लाहौर रवाना हुए थे। लेकिन उस वक्त पाकिस्तान करगिल जंग की तैयारी पूरी कर चुका था. लाइन ऑफ कंट्रोल के पास करगिल सेक्टर में आतंकवादियों के भेस में पाकिस्तानी सेना कई भारतीय चोटियों पर कब्जा कर चुकी थी।
गोरखा रेजीमेंट के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे सियाचिन की तैनाती के बाद छुट्टियों पर घर जाने की तैयारी में थे। लेकिन अचानक 2-3 जुलाई की रात उन्हें बड़े ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को खालुबार पोस्ट फतह करने की जिम्मेदारी मिली। रात के अंधेरे में मनोज कुमार पांडे अपने साथियों के साथ दुश्मन पर हमले के लिए कूच कर गए।
दुश्मन ऊंचाई पर छिपा बैठ कर नीचे के हर मूवमेंट पर नजर रखे हुए था। एक बेहद मुश्किल जंग के लिये मनोज कुमार अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे। पाकिस्तानी सेना को मनोज पांडे के मूवमेंट का जैसे ही पता चला उसने ऊंचाई से फायरिंग शुरु कर दी। लेकिन फायरिंग की बिना कोई परवाह किये मनोज काउंटर अटैक करते हुए और हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए आगे बढ़ रहे थे।
सबसे पहले उन्होंने खालुबार की पहली पोजिशन से दुश्मन का सफाया किया। आमने-सामने की लड़ाई में दो पाकिस्तानी सैनिकों को उड़ा दिया और पहला बंकर ध्वस्त कर दिया। उसके बाद उन्होंने दूसरी पोजिशन पर जमे पाकिस्तानी सैनिकों को मार कर दूसरा बंकर भी ध्वस्त कर दिया। इसके बाद मनोज कुमार पांडे अपने जवानों का हौसला बढ़ाते हुए और गोलियों की परवाह न करते हुए तीसरी पोजिशन की तरफ बढ़ चले। वहां भी उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों को मार कर उनका बंकर उड़ा दिया। लेकिन इस दौरान एक एक गोली उनके कंधे और पैर पर लग चुकी थी। इसके बावजूद मनोज रुके नहीं. वो चौथी पोजिशन से दुश्मन के खात्मे के लिये आगे बढ़ चले। उन्होंने हैंड ग्रेनैड फेंक कर बंकर ध्वस्त कर दिया। तभी दुश्मन की एक गोली उनके माथे पर लगी. मनोज देश के लिए शहीद हो गए। लेकिन वीरगति को प्राप्त होने से पहले खालुबार पर भारतीय सेना के कब्जे की नींव रख चुके थे। अपने मिशन में 11 पाकिस्तानी सैनिकों को मार चुके थे।
तिरंगे से लिपटे ताबूत में इस शहीद का शव जब लौटा तब पूरे देश के लोगों की आंखें नम हो गई। 24 साल की उम्र में एक जांबाज जिंदगी को अलविदा कहने से पहले देश के लिए अपना फर्ज पूरा कर गया।
‘परमवीर चक्र जीतना है’ मनोज कुमार पांडे से जब सेना में भर्ती के लिए इंटरव्यू में पूछा गया कि आप सेना में क्यों शामिल होना चाहते हैं तब उनका जवाब था कि वो परमवीर चक्र हासिल करना चाहते हैं।
मनोज का जवाब सुनकर सब हैरत में पड़ गए थे। मनोज ने अपनी कही बात को सच साबित कर दिखाया। करगिल की जंग में खालुबार पोस्ट फतह में बलिदान देकर वो परमवीर चक्र का मेडल अपनी वर्दी पर सजा चुके थे।
25 जून 1975 को सीतापुर के रुधा गांव में मनोज का जन्म गोपी चंद पांडे के परिवार में हुआ था। मनोज का सपना बचपन से ही सेना में जाने का था। मनोज बचपन से ही देश के वीरों के बलिदान की कहानी सुना करते थे। देश के महान वीरों को ही उन्होंने अपना आदर्श बनाया था। देशभक्ति की भावना ही उन्हें सेना में देश की सेवा करने के लिये ले गई. 12वीं के बाद उन्होंने सेना को ही चुना।
हालांकि वो बचपन से ही इतने मेधावी थे कि चाहते तो डॉक्टर या इंजीनियर बन सकते थे। वो आईआईटी और एनडीए दोनों में अच्छे नंबरों से पास हुए थे। लेकिन उन्होंने सेना को ही अपना जीवन समर्पित किया।
मनोज की सबसे खास बात ये थी कि वो कभी भी अपनी पढ़ाई के खर्चे के लिए पिता या परिवार पर बोझ नहीं बने। वो अपनी मेहनत के बूते स्कॉलरशिप लेकर पढ़ाई करते रहे. सैनिक स्कूल से पढ़ाई के बाद एनडीए की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद 11 गोरखा रायफल्स रेजिमेंट की पहली वाहिनी के अधिकारी बने। परिवार के लिए एक आदर्श पुत्र रहे तो देश के लिये भी एक आदर्श बेटे की तरह उन्होंने अपने फर्ज के लिए बलिदान करने में देर नहीं की।
मनोज की शहादत के बाद उनसे जुड़ी कई बातें सामने आईं। एक बार उन्हें अपनी बटालियन के साथ सियाचिन में तैनात होना था। लेकिन इनकी पोस्टिंग युवा अफसरों की ट्रेनिंग में कर दी गई। इससे मनोज बेहद परेशान रहने लगे थे क्योंकि वो बटालियन के साथ सरहद के दुर्गम और जोखिम भरे रास्तों पर जाना चाहते थे। एक दिन उन्होंने अपने कमांडिंग आफिसर को पत्र लिखकर कहा कि अगर उनकी टुकड़ी उत्तरी ग्लेशियर जाए तो उनकी पोस्टिंग बाना चौकी में की जाए। अगर उनकी टुकड़ी सेंट्रल ग्लेशियर जाए तो उनकी तैनाती पहलवान चौकी पर की जाए। आखिरकार उनकी बात मानकर उन्हें 19700 फीट ऊंची पहलवान चौकी पर तैनात किया गया। वो नहीं चाहते थे कि जब उनकी टुकड़ी कठिन परिस्थितियों में सरहद की सुरक्षा में जूझे तो वो आराम से अपने युवा अफसरों को ट्रेनिंग देकर वक्त गुजारें।
सियाचिन की चौकी से जब मनोज कुमार पांडे की टुकड़ी वापस लौटी तब उनकी छुट्टियों का समय हो गया था। लेकिन उन्होंने खुद आगे बढ़कर करगिल जंग के लिये दुश्मन पर हमले में शामिल होने के लिए इजाजत मांगी। अगर वो छुट्टी मांगते तो उनको छुट्टी मिल सकती थी। इसके बावजूद उन्होंने सेना के ऑपरेशन का हिस्सा बनने के लिये अपना नाम आगे बढ़ा दिया था। 2-3 जुलाई को निर्णायक जंग के लिए ये जांबाज़ अपनी टुकड़ी के साथ रवाना हो गया। कूच से पहले मनोज को लेफ्टिनेंट से पदोन्नत कर कैप्टन बनाया गया। साथ ही मिली खालूबार को फतह करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी।
मनोज 1/11 गोरखा राइफल्स की बी कंपनी के साथ मिशन खालुबार के लिये निकल पड़े और उस जंग की शुरुआत की जिसे करगिल की जंग कहा जाता है। मनोज कुमार पांडे इस जंग के हीरो थे और हमेशा हीरो रहेंगे।एजेन्सी।
पर विशेष। सुचेता मजूमदार का जन्म 25 जून, 1908 को पंजाब के अम्बाला(अब हरियाणा में ) शहर में हुआ था और सुचेता मजूमदार की शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी। शादी के बाद वे सुचेता मजूमदार से सुचेता कृपलानी हो गयी थी। 1963 से 1967 तक वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। सुचेता कृपलानी को देश के किसी भी सूबे की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। ये बंटवारे की त्रासदी में महात्मा गांधी के बेहद क़रीब रहीं। सुचेता मजूमदार कृपलानी उन चंद महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने बापू के क़रीब रहकर देश की आज़ादी की नींव रखी। वह नोवाखली यात्रा में बापू के साथ थीं। 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने से पहले वह लगातार दो बार लोकसभा के लिए चुनी गई। सुचेता दिल की कोमल तो थीं, लेकिन प्रशासनिक फैसले लेते समय वह दिल की नहीं, दिमाग की सुनती थीं। उनके मुख्यमंत्री काल के दौरान राज्य के कर्मचारियों ने लगातार 62 दिनों तक हड़ताल जारी रखी, लेकिन वह कर्मचारी नेताओं से सुलह को तभी तैयार हुई, जब उनके रुख़ में नरमी आई। जबकि सुचेता के पति आचार्य कृपलानी समाजवादी थे। आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्हें जेल की सज़ा हुई। 1946 में वह संविधान सभा की सदस्य चुनी गई। 1948 से 1960 तक वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की महासचिव थी।
भारत छोड़ो आंदोलन में लडकियों को ड्रिल और लाठी चलाना सिखाया। नोआखली के दंगा पीडित इलाकों में गांधी जी के साथ चलते हुए पीड़ित महिलाओं की मदद की। 15 अगस्त 1947 को संविधान सभा में वन्देमातरम् गाया। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में राज्य कर्मचारियों की हड़ताल को मजबूत इच्छाशक्ति के साथ वापस लेने पर मजबूर किया। पहले साम्यवाद से प्रभावित हुईं और फिर पूरी तरह गांधीवादी हो गईं। उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी की जिंदगी के ये पहलू उन्हें ऐसी महिला की पहचान देते हैं, जिसमें अपनत्व और जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। एक शख्सीयत कई रूप- आज इतने गुणों वाले राजनेता शायद ही मिलें। भारत छोड़ो आंदोलन में जब सारे पुरुष नेता जेल चले गए तो सुचेता कृपलानी ने अलग रास्ते पर चलने का फैसला किया। ‘बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।’ वह भूमिगत हो गईं। उस दौरान उन्होंने कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक आंदोलन भी चलाया। इसके लिए अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स बनाई। लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा और संकट में घिर जाने पर आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी। राजनीतिक कैदियों के परिवार को राहत देने का जिम्मा भी उठाती रहीं। दंगों के समय महिलाओं को राहत पहुंचाने, चीन हमले के बाद भारत आए तिब्बती शरणार्थियों के पुनर्वास या फिर किसी से भी मिलने पर उसका दुख-दर्द पूछकर उसका हल तलाशने की कोशिश हमेशा रहती।
1939 में नौकरी छोड़कर राजनीति में आईं। 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह किया और गिरफ्तार। 1941-1942 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महिला विभाग और विदेश विभाग की मंत्री।1942 से 1944 तक निरन्तर निरन्तर सफल भूमिगत आंदोलन चलाया फिर 1944 में गिरफ्तार किया गया। 1946 में केन्द्रीय विधानसभा की सदस्य। 1946 में संविधान सभा की सदस्य और फिर इसकी प्रारूप समिति की सदस्य बनीं। 1948-1951 तक कांग्रेस कार्यकारिणी की सदस्य। 1948 में पहली बार विधानसभा के लिए चुनी गईं। 1950 से लेकर 1952 तक प्रॉविजनल लोकसभा की सदस्य रहीं। 1949 में संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा अधिवेशन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल की सदस्य के रूप में गईं। 1952 और 1957 में नई दिल्ली से लोकसभा के लिए निर्वाचित। इस दौरान लघु उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रहीं। 1962-1967 तक मेंहदावल से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित। 2 अक्तूबर, 1963 से 13 मार्च, 1967 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री। 1967 में गोण्डा से लोकसभा के लिए चुनी गईं। स्वतंत्रता आंदोलन में श्रीमती सुचेता कृपलानी के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। 1 दिसंबर, 1974 को उनका निधन हो गया। एजेन्सी।





