पुण्य तिथि पर विशेष। बेमिसाल अभिनेता प्राण कृष्ण सिकंद  का जन्म जन्म 12 फरवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में  संपन्न परिवार में हुआ था।  प्राण बॉलीवुड के शुरूआती दौर के एक ऎसे खलनायक थे जिन्होंने पचास से सत्तर के दशक तक फिल्म इंडस्ट्री पर एकछत्र राज किया।  इस दौरान उन्होंने जितने भी फिल्मों में अभिनय किया उससे लगता था कि उनके द्वारा अभिनीत पात्रों का किरदार केवल वे ही निभा सकते थे। । प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था।   1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फ़िल्मों में उतारने की सोची और एक पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” बनाई, जो बेहद सफल रही। फिर क्या था, इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं। 1947 तक वह 20 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके थे और  हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे। हालांकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज़्यादा पसंद करते थे।

तिरछे होंठो से संवाद बोलना और चेहरे के भाव को पल-पल बदलने में निपुण प्राण ने उस दौर में खलनायक को भी एक अहम पात्र के रूप में सिने जगत में स्थापित कर दिया।  उनके द्वारा गंभीर आवाज में बोला गया डायलोग “बरखुद्दार” आज भी हिंदी फिल्म जगत के कुछ चुनिन्दा प्रसिद्ध डायलोगों में  है। 

प्राण ने प्रारम्भ में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फ़िल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका में अभिनय 1942 से 1991 तक जारी रखा।  उन्होंने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता की तर्ज पर भी काम किया ।  खेलों के प्रति प्राण का प्रेम भी जगजाहिर है।  50 के दशक में उनकी अपनी फुटबॉल टीम ‘डायनॉमोस फुटबाल क्लब’ बहुचर्चित रहा है। 

प्राण अभिनीत महत्वपूर्ण फिल्मों में ‘आह’, ‘चोरी-चोरी’, ‘छलिया’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘दिल ही तो है’, ‘नया अंदाज’, ‘आशा’, ‘बेवकूफ’, ‘हाफ टिकट’, ‘मन मौजी’, ‘एक राज’, ‘जालसाज’, ‘साधु और शैतान’, ‘शहीद’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘बे-ईमान’, ‘सन्यासी’, ‘दस नम्बरी’, ‘पत्थर के सनम’ भी शामिल हैं । 

1967 में आई फिल्म ‘उपकार’ में अपाहिज मंगल चाचा के किरदार में दर्शकों ने प्राण को खलनायकी से बिल्कुल अलग अंदाज में देखा और उसके बाद प्राण ‘हमजोली’, ‘परिचय’, ‘आंखों आंखों में’, ‘झील के उस पार’, ‘जिंदादिल’, ‘जहरीला इंसान’, ‘हत्यारा’, ‘चोर हो तो ऐसा’, ‘धन दौलत’, ‘जानवर’, ‘राज तिलक’, ‘इन्साफ कौन करेगा’, ‘बेवफाई’, ‘ईमानदार’, ‘सनम बेवफा’, ‘1942 ए लव स्टोरी’ के जरिए  चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित हुए। 

फिल्म ‘जंजीर’ में प्राण पर फिल्माया गया गीत ‘यारी है ईमान मेरा’ उनकी खास अदाकारी के कारण आज भी  सदाबहार गाना है ।  निर्देशक प्रकाश मेहरा को फिल्म ‘जंजीर’ के लिए अमिताभ बच्चन का नाम प्राण ने ही सुझाया था, जिसने अमिताभ के करियर को नई दिशा दी । 

प्राण ने अपने कैरियर के दौरान विभिन्न पुरूस्कार और सम्मान अपने नाम किये।  उन्होंने 1967, 1969 और 1972 में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरूस्कार और 1997 में फिल्मफेयर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड जीता।  उन्हें  2000 में स्टारडस्ट द्वारा ‘मिलेनियम के खलनायक’ द्वारा पुरस्कृत किया गया ।  2001 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया और भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये 2013 में दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाजा गया।  2010 में सीएनएन की सर्वश्रेष्ठ 25 सर्वकालिक एशियाई अभिनेताओं में चुना गया।  इस महान कलाकार ने 12 जुलाई 2013 को मुम्बई के लीलावती अस्पताल में अन्तिम साँस ली ।  उल्लेखनीय बात यह भी है कि उनके जन्म और मृत्यु की तिथि की संख्या एक ही थी । एजेन्सी 

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