ओम राजेश पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन प्रसिद्ध अभिनेताओं में थे, जो अपनी अभिनय क्षमता से किसी भी किरदार को पर्दे पर जीवंत करने में सक्षम थे। वे भारतीय सिनेमा के कालजयी अभिनेता थे। उनके अभिनय का हर अन्दाज दर्शकों को प्रभावित करता है। रूपहले पर्दे पर जब ओम पुरी का हँसता-मुस्कुराता चेहरा दिखता है तो दर्शकों को भी अपनी खुशियों का अहसास होता है और उनके दर्द में दर्शक भी दु:खी होते हैं। हिन्दी फ़िल्मों में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार और पद्मश्री आदि से भी सम्मानित किया गया था।
ओम पुरी हिन्दी सिनेमा के वह सितारे थे, जिन्हें लोग हर भूमिका में देखना पसंद करते थे। कलात्मक सिनेमा हो या कमर्शियल सिनेमा, वह सभी जगह अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे।
ओम पुरी का जन्म 18 अक्टूबर, 1950 को अम्बाला में हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय अम्बाला में ही व्यतीत हुआ। उनके पिता रेलवे में नौकरी करते थे, इसके बावजूद परिवार का गुजारा बामुश्किल चल रहा था। ओम पुरी का परिवार जिस मकान में रहता था। उसके पास रेलवे यार्ड था। ओम पुरी को ट्रेनों से काफ़ी लगाव था। रात के वक्त वह अक्सर घर से निकलकर रेलवे यार्ड में जाकर किसी भी ट्रेन में सोने चले जाते थे। यही वह वक्त था,जब ओम पुरी सोचते थे कि में बड़ा होकर रेलवे ड्राइवर बनूंगा। बताया जाता है कि ओम के पिता शराब पीने के आदी थे, जिसकी वजह से उनकी माँ उन्हें लेकर पटियाला स्थित अपने मायके सन्नौर चली गई थीं।
ओम पुरी ने अपने परिवार की समस्या व जरूरतों को पूरा करने के लिए ढाबे पर नौकरी भी की। कुछ समय बाद ढाबे के मालिक ने उन पर चोरी का आरोप लगाते हुए नौकरी से हटा दिया। फिर कुछ समय बाद ओम पुरी पटियाला में स्थित गांव सन्नौर में अपने ननिहाल चले आए। वहां प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। इसी दौरान उनका रुझान अभिनय की ओर हो गया और वे सिनेमा जगत् के लिए जागरूक से होने लगे और धीरे-धीरे नाटकों में हिस्सा लेने लगे। फिर खालसा कॉलेज में दाखिला लिया। उसी दौरान ओम पुरी वकील के यहां मुंशी का काम भी करने लगे।
एक साक्षात्कार में ओम पुरी ने खुलासा किया था कि शुरुआती दिनों में वे चंडीगढ में वकील के साथ मुंशी थे। एक बार चंडीगढ़ में उनके नाटक की परफॉर्मेंस थी, लेकिन वकील ने उन्हें तीन छुट्टी देने से मना कर दिया। इस पर ओम पुरी ने कहा- अपनी नौकरी रख ले, मेरा हिसाब कर दे। जब कॉलेज के लड़कों को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी तो उन्होंने प्रिंसिपल से बात की। इस पर प्रिंसिपल ने प्रोफेसर से कहा- कॉलेज में कोई जगह है क्या। इस पर उन्होंने कहा- है एक लैब असिस्टेंट की,लेकिन ये आज का स्टूडेंट है, इसे क्या पता साइंस के बारे में। प्रिंसिपल बोले- कोई बात नहीं, लड़के अपने आप कह देंगे, नीली शीशी पकड़ा दे, पीली शीशी पकड़ा दे। इस नौकरी के साथ ही ओम पुरी कॉलेज में हो रहे नाटकों में भी हिस्सा लेते रहे।
इसी समय उनकी मुलाकात हरपाल और नीना टिवाना से हुई, जिनके सहयोग से वह पंजाब कला मंच नाट्य संस्था से जुड़ गए। फ़िल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया से स्नातक के बाद ओम पुरी ने दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से अभिनय का कोर्स किया। यहीं पर उनकी मुलाकात नसीरुद्दीन शाह से भी हुई। फिर अभिनेता बनने का सपना लेकर उन्होंने 1976 में पुणे फ़िल्म संस्थान में दाखिला ले लिया।
ओम पुरी का निजी जीवन कई बार विवादों के घेरे में आया। उन्होंने दो विवाह किये थे। उनकी पहली पत्नी का नाम सीमा है, किंतु यह दाम्पत्य जीवन अधिक लम्बा नहीं चला और उनका तलाक हो गया। इसके बाद ओम पुरी ने नंदिता पुरी से विवाह किया। नंदिता और ओम पुरी एक पुत्र के माता-पिता भी बने। उनके पुत्र का नाम ईशान है।
नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से अभिनय का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ओम पुरी ने हिन्दी फ़िल्मों की ओर रूख किया। 1976 की फ़िल्म घासीराम कोतवाल में वे पहली बार हिन्दी दर्शकों से रू-ब-रू हुए। घासीराम कोतवाल की संवेदनशील भूमिका में अपनी अभिनय क्षमता का प्रभावी परिचय ओम पुरी ने दिया और धीरे-धीरे वे मुख्य धारा की फ़िल्मों से अलग समानांतर फ़िल्मों के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता के रूप में उभरने लगे।
1981 में ओम पुरी को फ़िल्म आक्रोश’ मिली। आक्रोश में उनके अभिनय की जमकर तारीफ़ हुई। इसके बाद फ़िल्मी दुनिया में उनकी गाड़ी चल निकली। भवनी भवई, स्पर्श, मंडी, आक्रोश और शोध फ़िल्मों में ओम पुरी के सधे हुए अभिनय का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोला। किंतु उनके फ़िल्मी सफर में मील का पत्थर साबित हुई- अर्धसत्य।
अर्धसत्य में युवा, जुझारू और आंदोलनकारी पुलिस ऑफिसर की भूमिका में वे बेहद जँचे।
धीरे-धीरे ओम पुरी समानांतर सिनेमा की बड़ी जरूरत बन गए। समानांतर सिनेमा जगत् में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ-साथ ओम पुरी ने मुख्य धारा की फ़िल्मों का भी रूख किया। कभी नायक, कभी खलनायक तो कभी चरित्र अभिनेता और हास्य अभिनेता के रूप में वे हर दर्शक वर्ग से रू-ब-रू हुए और उनकी प्रशंसा के पात्र बने।
नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल के साथ ओम पुरी ने भवनी भवई, अर्धसत्य, मिर्च मसाला और धारावी फ़िल्मों में काम किया।
ओम पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन गिने-चुने अभिनेताओं की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनायी है। ईस्ट इज ईस्ट, सिटी ऑफ़ ज्वॉय, वुल्फ़, द घोस्ट एंड डार्कनेस हॉलीवुड फ़िल्मों में भी उन्होंने अपने उम्दा अभिनय की छाप छोड़ी है। सैम एंड मी, सिटी ऑफ़ ज्वॉय और चार्ली विल्सन वार जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्मों समेत उन्होंने लगभग 200 फ़िल्मों में काम किया। चार्ली विल्सन में उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक की भूमिका निभाई थी।
मकबूल और देव जैसी गंभीर फ़िल्मों में अभिनय करने वाले ओम पुरी अपने सशक्त अभिनय के साथ ही अपनी सशक्त आवाज़ के लिए भी जाने जाते हैं।
वे नायक या खलनायक नहीं, बल्कि चरित्र या हास्य अभिनेता के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के दर्शकों को लुभा रहे थे। चाची 420, हेरा फेरी, मेरे बाप पहले आप, चुपके-चुपके और मालामाल वीकली में ओम पुरी हँसती-गुदगुदाती भूमिकाओं में थे शूट ऑन साइट, महारथी, देव और दबंग में चरित्र अभिनेता के रूप में वे दर्शकों के सामने आये।
6 जनवरी 2017 को दिल का दौरा पड़ने से 66 साल की उम्र में इनका निधन हो गया था। कैपीटॉल न्यूज़ एंड फ़ीचर





