रुआल आमुन्सन नार्वे के साहसी अन्वेषक थे जिन्होंने ध्रुवीय क्षेत्रों की साहसिक यात्राएँ की। उन्होंने 1910- में दक्षिणी ध्रुव की खोजयात्रा का नेतृत्व किया जिससे 1911 में उसकी खोज हुई। रुआल पहले उत्तरी ध्रुव की खोज करने निकले थे लेकिन जब उन्हें पता चला कि उत्तरी ध्रुव की खोज फ्रेडरिक कूक और रॉबर्ट पीयरी कर चुके हैं तो उन्होंने बड़े ही गोपनीय ढंग से दक्षिणी ध्रुव की खोज शुरु कर दी। रुआल ने अपने जहाज के दल और उनकी खोज की फंडिंग करने वाले लोगों को भी इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि दक्षिणी ध्रुव की खोज करने जा रहे हैं।
जब उत्तरी ध्रुव की खोज किए जाने की रिपोर्ट्स आने लगी तो रुआल की खोज के लिए फंडिंग कम होने लगी। इस परेशानी से निपटने के लिए रुआल ने अपना घर भी गिरवी रख दिया था। रुआल की खोज की यात्रा बड़ी ही रोमांचक रही थी। उनके जहाज दल में 19 लोग शामिल थे और लगभग 100 ग्रीनलैंड नस्ल के कुत्ते थे जो बर्फीले रास्तों पर स्लेज गाड़ी के जरिए सफर तय करने में मदद करते हैं। साथ ही रुआल के जहाज पर लाइब्रेरी भी थी जिसमें लगभग 3000 किताबें थीं। इसके अलावा दल का मनोबल बनाए रखने के लिए जहाज पर कुछ ग्रामोफोन और संगीत के उपकरण भी थे।
रुआल की खोज रोमांच के साथ-साथ बड़े खतरों से भरी थी। बे ऑफ व्हील्स में अपना बेस तैयार करके उन्होंने दक्षिणी ध्रुव की खोज की शुरुआत की। शुरुआत गलत होने की वजह से उनके दल के कुछ कुत्ते खो गए। वहीं खोज की शुरुआत के समय काफी ठंड और गलत शुरुआत होने से रुआल के दल का मनोबल टूटने लगा उन्हें वापिस अपने बेस पर जाना पड़ा। जब सर्दी थोड़ी कम हुई तो दल ने फिर से अपनी खोज की शुरुआत की। अपनी मंजिल पर पहुंचने के बाद रुआल ने उसका अच्छे से मुआयना किया ताकी वह यह दावा कर सकें कि वह ही पहले शख्स हैं जिन्होंने दक्षिणी ध्रुव की खोज की है। उन्होंने ही सबसे पहले 1903-06 में उत्तर-पश्चिम मार्ग की यात्रा की।
रोआल्ड एमंडसन का जन्म 16 जुलाई 1872 को हुआ था, परंतु उन्होंने शिक्षा क्रिस्चियाना में (जिसका नाम अब ओसलो है) पाई थी। 1890 में उन्होंने बी.ए. पास किया और आयुर्विज्ञान (मेडिसिन) पढ़ना आरंभ किया, परंतु मन न लगने से उसे छोड़ उसने जहाज पर नौकरी कर ली। 1903-06 में वह ग्योआ नामक छोटे जहाज में अपने छह साथियों के साथ उत्तर ध्रुव की खोज करते रहे और उत्तर चुंबकीय ध्रुव का पता लगाया। 1910-12 में वह दक्षिण ध्रुव की खोज करते रहे और वही पहला व्यक्ति थे जो दक्षिण ध्रुव तक पहुँच सके । प्रथम विश्वयुद्ध के कारण उन्होंने कई वर्षो तक चुपचाप बैठना पड़ा था । 1918 में उन्होंने फिर उत्तर ध्रुव पहुँचने की चेष्टा की, परंतु सफलता न मिली। तब उन्होंने नॉर्ज नामक नियंत्रित गुब्बारे (डिरिजिबिल) में उड़कर दो बार उत्तर ध्रुव की प्रदक्षिणा की और 71 घंटे में 2,700 मील की यात्रा करके सफलापूर्वक फिर भूमि पर उतरे । जब जनरल नोबिल का हवाई जहाज उत्तर ध्रुव से लौटते समय मार्ग में दुर्घटनाग्रस्त हो गया तो आमुंसन ने बड़ी बहादुरी से उसको खोजने का बीड़ा उठाया। 17 जून 1928 को उन्होंने इस काम के लिए हवाई जहाज में प्रस्थान किया, परंतु फिर उसका कोई समाचार संसार को प्राप्त न हो सका।एजेंसी।

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