इस्लाम हुसैन। इस देश और इस राज्य की विरासत संघर्ष, इंसानियत और लोकतंत्र की है। इसलिए इस समय इस वीर को याद करना बहुत ज़रूरी है। आप भी आ जाइएगा! अपनी विरासत को ज़िंदा रखें!_।
आज 23 अप्रैल को उत्तराखंड प्रदेश भर में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और पेशावर कांड की बरसी पर कार्यक्रम हो रहे हैं। 
याद रखने वाला दिन 23 अप्रैल 1930 का था। जगह थी पेशावरका किस्सा ख्वानी बाजार, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान के नेतृत्व में महात्मा गाँधी जी से प्रेरणा लेते हुए हज़ारों पठान मुसलमान अंग्रेज़ों से आज़ादी के लिए सत्याग्रह कर रहे थे। चंद्र सिंह गढ़वाली उस समय फ़ौज़ में गढ़वाल रेजिमेंट के कमांडर थे। शांतिपूर्ण तरीकों से पठान लोग इकट्ठा हो रहे थे। अंग्रेज़ों ने गढ़वाली रेजिमेंट को बताया था कि पठान गौ हत्या करते हैं, वे हिन्दुओं के खिलाफ हैं। अंग्रेज़ों ने सोचा कि नफरत और साम्प्रदायिकता का फायदा उठा कर हमारे राज को हम जारी रखेंगे। लेकिन जैसे ही अंग्रेजी कमांडर ने गोली चलाने का आदेश दिया, वैसे ही चंद्र सिंह गढ़वाली ने गढ़वाल रेजिमेंट को चिल्ला कर आदेश दिया की आप गोली नहीं चलाएंगे। सारे जवानों ने अपनी राइफल नीचे रख दी। एक जवान ने अपनी राइफल जनता को दे दिया यह बोलते हुए कि अभी आप हम पर गोली चला सकते हैं।
उस दिन वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने नफरत और दमन का पक्ष छोड़ कर इंसानियत का पक्ष लिया। शासकों की नज़र में यह अपराध थी, जिसके लिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को 14 साल जेल में रहना पड़ा। चंद्र सिंह गढ़वाली शुरुआत में गांधी जी से प्रभावित थे जेल से रिहा ज्ञोने के बाद वे गांधी जी की कर्मभूमि वर्धा में भी रहे। बाद में वे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो कर लगातार शोषण, गरीबी, जातिवाद, और साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ते रहे। ज़िन्दगी भर उनको गरीबी में रहना पड़ा।
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली हमारे देश की संघर्षशील विरासत और असली देशभक्ति के प्रतीक है। उस विरासत और उनके सिद्धांतों को ज़िंदा रखना हमारा फ़र्ज़ है।
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