एजेन्सी। मंगलेश डबराल, हिन्दी की आधुनिक कविता के अत्यंत सम्मानीय और शीर्ष रचनाकारों में  हैं। उन्होंने हिन्दी कविता को नये अनुभवों से सम्पन्न किया है। ‘पहाड़ पर लालटेन’ उनका पहला संग्रह था जो 1981 में आया और ‘नये युग में शत्रु’ सबसे नया संग्रह है जो 2013 में प्रकाशित हुआ। मंगलेश डबराल का सुंदर, सोद्देश्य गद्य उनकी यात्रा डायरी ‘एक बार आयोवा’ और ‘लेखक की रोटी’ में देखा जा सकता है। वह अपने समय के सिनेमा, सांस्कृतिक सवालों और संचार माध्यमों के अलावा विश्व की संवेदनशील घटनाओं पर टिप्पणी करते रहे हैं। विश्व कविता के उन्होंने कुछ सुनहरे अनुवाद किये हैं।

मंगलेश डबराल का जन्म  16 मई, 1948 को टिहरी गढ़वाल, कापफलपानी गाँव में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। दिल्ली आकर हिन्दी पैट्रियट, प्रतिपक्ष और आसपास में काम करने के बाद वे भोपाल में मध्य प्रदेश कला परिषद्, भारत भवन से प्रकाशित साहित्यिक त्रैमासिक पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे। इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित ‘अमृत प्रभात’ में भी कुछ दिन नौकरी की।  1983 में ‘जनसत्ता’ में साहित्य संपादक का पद सँभाला। कुछ समय ‘सहारा समय’ में संपादन कार्य करने के बाद वह नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े रहे।

दिल्ली हिन्दी अकादमी के साहित्यकार सम्मान, कुमार विकल स्मृति पुरस्कार और अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना ‘हम जो देखते हैं’ के लिए साहित्य अकादमी द्वारा 2000 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मंगलेश डबराल की ख्याति अनुवादक के रूप में भी है।

मंगलेश डबराल की कविताओं के भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, डच, स्पेनिश, पुर्तगाली, इतालवी, फ़्राँसीसी, पोलिश और बुल्गारियाई भाषाओं में भी अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कविता के अतिरिक्त वे साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति के विषयों पर नियमित लेखन भी करते हैं। मंगलेश की कविताओं में सामंती बोध एवं पूँजीवादी छल-छद्म दोनों का प्रतिकार है। वह यह प्रतिकार किसी शोर-शराबे के साथ नहीं अपितु प्रतिपक्ष में एक सुन्दर स्वप्न रचकर करते हैं। उनका सौंदर्य बोध सूक्ष्म है और भाषा पारदर्शी है।

हिन्दी के प्रख्यात कवि, पत्रकार व साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मंगलेश डबराल का , 9 दिसंबर 2020 को कोरोना वायरस संक्रमण से निधन हो गया। वे 72 वर्ष के थे। भारत कोष से

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