के. बालाचंदर प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता निर्देशक और पटकथा लेखक थे । भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए 2010 के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार के. बालाचंदर को दिया गया था । के. बालाचंदर ने हिन्दी फ़िल्म ‘एक दूजे के लिए’ से उत्तर भारत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई थी ।
9 जुलाई, 1930 को तमिलनाडु के तंजावुर में जन्मे के. बालाचंदर ने ‘अन्नामलाई विश्वविद्यालय’ से 1949 में बी.एस.सी. किया। इसके बाद वह नौकरी करने लगे थे, नाटककार के रूप में उन्होंने ‘मेजर चंद्रकांत’, ‘नीरकुमिझी’, ‘सरवर सुंदरम्’ और ‘नवग्रहम्’ नाटक दिए। बाद में वह अभिनय में भी उतर आए। एम.जी. रामचंद्रन ने उनसे अपनी फ़िल्म के लिए संवाद भी लिखवाए। पिता-पुत्र संबंध पर आधारित उनकी फ़िल्म ‘अपूर्व रागनगल’ और तलाकशुदा जीवन पर बनी ‘अवरगल’ को पर्याप्त प्रसिद्धि मिली। उन्होंने कन्नड़, तमिल, तेलुगु और हिन्दी में 100 से अधिक फ़िल्मों का निर्माण किया है। उन्हें अलग तरह की फ़िल्म निर्माण तरीके के लिए जाना जाता है।
बालाचंदर को रजनीकांत, कमल हासन, प्रकाशराज और विवेक जैसे वर्तमान दौर के कई सितारों को फ़िल्मी दुनिया में लाने का श्रेय है।
1965 में फ़िल्म उद्योग में आए और नागेश अभिनीत अपनी पहली ही फ़िल्म ‘नीरकुमिझीझ’ से ख्याति अर्जित कर ली। उसके बाद से उन्होंने कई फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन किया, जिन्होंने कई राष्ट्रीय पुरस्कार और राज्य सरकारों तथा अन्य संगठनों के पुरस्कार जीते। उनकी उल्लेखनीय फ़िल्मों में ‘अपूर्वा रागागल’, ‘अवर्गल’, ’47 नटकल’, ‘सिंधु भैरवी’, ‘एक दूजे के लिए’ (हिन्दी), तेलुगू में ‘रुद्रवीणा’ तथा कन्नड में ‘अरालिदाहवू’ शामिल हैं।
फ़िल्म ‘रोजा’ के लिए मणिरत्नम को ‘नरगिस दत्त पुरस्कार’ मिला, वह के. बालाचंदर ने ही निर्मित की थी। फ़िल्म की कहानी, तकनीक, संवाद, निर्देशन और निर्माण को लेकर बालाचंदर की नज़र हमेशा खोजी की रही है। वह दर्शक को ध्यान में रखने के साथ ही अपने नज़रिए को भी कभी पीछे नहीं होने देते। यही वजह है कि अनेक विभागों में उन्हें कई बार ‘नेशनल फ़िल्म अवार्ड’ मिला। इनमें सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ स्क्रीन प्ले, सामाजिक विषयों पर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और राष्ट्रीय सद्भाव पर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्में शामिल हैं। 23 दिसंबर 2014 को इनका निधन हो गया था। एजेन्सी