– वीर विनोद छाबड़ा। एक थे महेश कौल। वो जोधपुर (10 अप्रैल 1911 ) से बम्बई आये थे, फ़िल्मों में गीत और संवाद लिखने। सफल भी रहे। लेकिन सपनों की दुनिया में किस्मत बदलते देर नहीं लगती। वो एक्टिंग भी करने लगे। उनकी पहली फिल्म थी, नया संसार (1941) जिसके हीरो थे अशोक कुमार। विख्यात उर्दू सहाफ़ी ख्वाजा अहमद अब्बास ने भी बतौर फिल्म लेखक अपना फ़िल्मी कैरीयर प्रारंभ किया था। महेश ने अन्य कई फिल्मों में भी काम किया। लेकिन वो इतने से संतुष्ट नहीं हुए। डायरेक्शन में भी दखल देना शुरू किया। पहली फिल्म थी, गोपीनाथ (1948) जिसमें राजकपूर की नायिका थीं तृप्ति मित्रा, इप्टा की मशहूर आर्टिस्ट। राजकपूर को इसी फिल्म से पहचान मिली।
उसके बाद महेश कौल ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। अगली फिल्म ‘नौजवान’ (नलनी जयवंत-प्रेमनाथ) का ये गाना बहुत उन दिनों जन जन की ज़ुबान पर था…ठंडी हवाएं लहरा के आएं…शम्मी कपूर को सबसे पहले ‘जीवन ज्योति’ (1953) में ब्रेक देने वाले महेश ही थे। 1958 में रिलीज़ हुईं नूतन-शेखर की ‘आखरी दांव’ और राजेंद्र कुमार-कामिनी कदम की ‘तलाक़’ बहुत पसंद की गयीं। इसके लिए उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नॉमिनेट भी हुए। हिंदी सिनेमा की पहली रंगीन सिनेमास्कोप फिल्म भी महेश ने ही बनायी, प्यार की प्यास(1961). अपने प्रोडक्शन के बाहर बतौर एक्टर गुरुदत्त की जिस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, वो सौतेला भाई (1962) थी और इसे भी महेश ने डायरेक्ट किया था।

राजकपूर-सायरा बानो की एकमात्र फिल्म ‘दीवाना’ (1967) महेश ने बनायी, लेकिन दुर्भाग्य से ये फिल्म सनसनी नहीं मचा सकी। महेश कौल का ढेर पैसा डूब गया। हेमामालिनी की पहली फिल्म ‘सपनों का सौदागर’ (1968) भी महेश ने डायरेक्ट की। इसके हीरो राजकपूर थे। ये बेमेल जोड़ी भले जम नहीं पायी, लेकिन हेमा मालिनी की किस्मत चमक गयी। राजेंद्र कुमार-वहीदा रहमान की मुस्लिम सोशल ‘पालकी’ (1967) के डायरेक्टर एस.यू.सुन्नी का फिल्म निर्माण के बीच ही देहांत हो गया। तब महेश ने बाकी फिल्म पूरी की। संजीव कुमार-शारदा की ‘अग्नि रेखा’ (1973) महेश की अंतिम डायरेक्टेड मूवी रही, जो उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ हुई।
इस बीच महेश कौल बतौर एक्टर भी झलक दिखलाते रहे। उल्लेखनीय रहीं, गुरुदत्त की ‘कागज़ के फूल’ (1959) जिसमें वो गुरुदत्त के पाश्चात्य विचारों वाले ससुर थे। दूसरी रही, 1972 में रिलीज़ हुई देवानंद की ‘तेरे मेरे सपने’। इसमें महेश एक मरते हुए आदमी के किरदार में थे। दुर्भाग्य से जब फिल्म रिलीज़ हुई तब महेश सख्त बीमार थे और एक अस्पताल में भर्ती थे। उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत ख़राब थी, दवाईयां तक खरीदनी मुश्किल हो रही थीं। खबर पाकर देवानंद उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे। महेश ने उनसे शिक़ायत की, मुझे फिल्म के प्रीमियर पर आपने नहीं बुलाया।
देव साहब बोले, कौल साहब आप जल्दी से ठीक हो जाएँ तब हम साथ-साथ बैठ कर ‘तेरे मेरे सपने’ देखेंगे। यह कहते हुए देव साहब ने उन्हें  मोटी रकम भी दी। महेश बोले, मुझे ख़ैरात नहीं चाहिए।
देव साहब ने समझाया, ये एडवांस है उस फिल्म का जो आप मेरे लिए लिखने वाले हैं। उस फिल्म का नाम था, An Appointment With Destiny यानी नियति से मुलाक़ात।
कुछ दिन बाद महेश ने अपने मित्र जानकीदास से कहा, आत्मा शरीर के साथ बहुत दिन तक नहीं रहती है। अब नियति से मेरी मुलाक़ात का समय आ गया है। मुझे मालूम है, देवानंद इसे अच्छी तरह जानते थे। उनके दिए एडवांस से मेरी ज़िंदगी के कुछ दिन बढ़ गए। लाइट्स ऑन…कैमरा…एक्शन…और कुछ क्षणों बाद यानी 2 जुलाई 1972 को महेश कौल की आत्मा ने नश्वर शरीर छोड़ दिया। शरीर से उनका साथ 61 साल तक ही रहा।

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