भारत की प्रथम रेलगाड़ी संचालित करने का गौरव : आई.आई.टी रूडकी के अभिलेखागार व रूडकी रेलवे स्टेशन से मिले पुराने दस्तावेजों के आधार पर यह खोज हुई थी की नहर की खुदाई के दौरान मिट्टी व माल ढुलाई में आ रही दिक्कतों व लगने वाले अधिक समय को कम करने के लिए पहली बार 22 दिसंबर 1851 में भाप के इंजन से चलने वाली देश की पहली दो डिब्बों की मालगाड़ी मिट्टी व माल ढुलाई हेतू रूड़की व पिरान कलियर के बीच चलाई गई थी। बाद में इंजन के खराब हो जाने व नहर का निर्माण कार्य पूरा हो जाने की वजह से रेलवे ट्रैक की आवश्यकता महसूस नहीं की गई, अत: ट्रैक को नहर निर्माण के उपरांत उखाड़ लिया गया तथा इंजन वापस इंग्लैंड भेज दिया गया। बाद में भाप से चलने वाले देश के उस पहले लोकोमोटिव की एक प्रतिकृति इंग्लैंड से पुन: मंगाकर रूड़की रेलवे स्टेशन पर रखी गई, जिसे कभी हर शनिवार कोयले की भाप से चलाया जाता था।
लोकोमोटिव का नाम “सर जेम्स थॉमसन” के नाम पर रखा गया था। जिसे बाद में स्वीडिश ओपरा गायिका #जेनीलिंड का नाम दिया गया था।

रूडकी रेलवे स्टेशन पर (भारतीय रेलवे के 150 साल की पूरे होने की याद में) 2003 में लगे पत्थर पर इस खोज को मान लिया गया है की बम्बई (मुम्बई) और ठाणे के बीच 1853 में पहली बार भाप इंजन रेल पटरी पर दौड़ा यह तारीख सही नहीं है

समस्या यह थी कि नहर को नदी के बीच से कैसे लाया जाए? इसका उन्होंने नायाब हल तलाशा। तय किया गया कि नदी के ऊपर पुल  बना नहर को गुजारा जाए। पुल निर्माण के लिए नदी में खंभे बनाए जाने थे और इसके लिए खुदाई करनी थी। तय किया गया भारी मात्रा में निकलने वाले मलबे को कलियर के पास डाला जाए।

समस्या यह थी घोड़े और खच्चरों से इस पर भारी लागत आने के साथ ही समय भी ज्यादा लगना था। कर्नल  कॉटले ने इसके लिए रेल ट्रैक बनवाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने लंदन से उपकरण मंगवाए और वहीं के विशेषज्ञों से रुड़की में ही इंजन और चार वैगन तैयार कराईं। इंजन का नामकरण उत्तर पश्चिमी प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर सर जेम्स थॉमसन के नाम पर किया गया।

हालांकि बाद में इसको बदल स्वीडन की प्रसिद्ध गायिका जेनी लिंड के नाम पर रखा गया। भाप से चलने वाले इस इंजन की सहायता से दो वैगनों में एक बार में 180 से 200 टन मिट्टी ढोई गई। इंजन की रफ्तार थी 6.4 किलोमीटर प्रति घंटा और पूरे एक साल तक यानी दिसंबर 1852 तक यह पटरियों पर दौड़ता रहा। दो साल बाद 1854 में गंगनहर का निर्माण पूरा हो गया। नहर को बनने में 12 साल लगे।

भारतीय रेल के 150 वर्ष पूरे होने पर  2003 में जेनी लिंड इंजन का मॉडल रुड़की रेलवे स्टेशन पर स्थापित किया गया। अमृतसर स्थित रेल कारखाने में तैयार इस मॉडल से कुछ वर्ष पहले तक प्रत्येक शनिवार और रविवार शाम चार से छह बजे तक छुक-छुक आवाज भी सुनी जा सकती थी। लेकिन रखरखाव के अभाव में अब यह शांत खड़ा रहता है।

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