अरुणा शानबाग की कहानी किसी दर्दनाक हादसे से कम नहीं है. सिरफिरे ने बदले के लिए हंसती-खेलती लड़की को बेजान कर दिया था. दिन-रात मरीजों की सेवा करने वाली अरुणा शानबाग 42 सालों तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी रही और उसी बिस्तर पर उस बेजान शरीर ने भी अरुणा का साथ छोड़ दिया था।

अरुणा शानबाग ने बम्बई अब मुंबई के केईएम अस्पताल में ट्रेनी नर्स के रूप में काम संभाला था. मरीजों की सेवा करने में उसे बड़ी खुशी मिलती थी।

केईएम अस्पताल की डॉग रिसर्च लेबोरेटरी में काम करते हुए अरुणा ने को यह जानकारी मिली थी कि सोहनलाल नाम का वार्ड बॉय कुत्तों के लिए लाए जाने वाले मटन की चोरी करता है. इस बात को लेकर अरुणा और सोहनलाल की कहासुनी हो गई. अरुणा ने अस्पताल प्रशासन से इसकी शिकायत भी कर दी थी. यह बात सोहनलाल को इतनी बुरी लगी कि उसने अरूणा पर जानलेवा हमला कर दिया।

सोहनलाल ने कुत्ते बांधने की चेन से अरुणा का गला घोटकर उसे मारने की कोशिश की. इस कारण अरुणा के दिमाग में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही थी, जिससे उसका शरीर बेजान हो गया. इसके बाद सोहनलाल ने अरुणा से रेप भी किया और उसे मरा समझकर वहां से भाग गया।
सोहनलाल पर हत्या के प्रयास और बलात्कार का मुकदमा चला. उसे सात साल की सजा हुई. हादसे के बाद अरुणा के रिश्तेदारों ने उनसे नाता तोड़ दिया. अस्पताल प्रबंधन का कहना था कि पिछले 42 सालों में उनका कोई भी रिश्तेदार न उनसे मिलाने आया न ही किसी ने कोई खबर ली।

अरुणा की यह हालत देखकर केईएम अस्पताल की पूर्व नर्स पिंकी वीरानी ने 2011 में उच्चतम न्यायालय में उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल के नर्सों और स्टॉफ की प्रशंसा की, जिन्होंने कई साल अरुणा की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी, उनका इतना ध्यान रखा कि अरुणा को इतने सालों तक बिस्तर पर लेटे रहने के बावजूद एक भी घाव तक नहीं हुआ।

अस्पताल प्रशासन के मुताबिक इस घटना से अरुणा को इतना गहरा सदमा लगा कि वह किसी पुरूष की आवाज से भी घबराने लगी थी. आखिरकार 18 मई 2015 को अरुणा के संघर्ष ने भी जवाब दे दिया और उन्होंने इस दुनिया को विदा कह दिया था। एजेन्सी।

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