रूप सिंह बैस भारतीय फील्ड हॉकी के भूतपूर्व खिलाडी थे। उन्हें भारत एवं विश्व हॉकी के क्षेत्र में सबसे बेहतरीन खिलाडियों में शुमार किया जाता है। वे दो बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं जिनमें 1932 का लॉस एंजेल्स ओलम्पिक एवं 1936 का बर्लिन ओलम्पिक शामिल है।
रूप सिंह के सम्मान में ग्वालियर के एक स्टेडियम का नाम रूप सिंह स्टेडियम रखा गया। 1936 के ओलंपिक में उनके शानदार प्रदर्शन के बाद म्यूनिख की एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया। लंदन में 2012 में हुए ओलंपिक में भी ध्यानचंद और लेस्ली क्लाडियस के साथ-साथ रूप सिंह के नाम पर एक मेट्रो स्टेशन का नाम रखा गया।
हॉकी के शानदार लेफ्ट इन खिलाड़ी रुप सिंह बैंस का जन्म 8 सितंबर, 1908 को जबलपुर में हुआ था । 1932 ओलिंपिक में जब भारतीय टीम में चयन हुआ, तो लॉस एंजिल्स जाने से इंकार कर दिया। उनके पास कपड़े नहीं थे। ध्यानचंद उन्हें अपने पैसों से कपड़े खरीद कर दिये। उनका एक सूट सिलवाया तब जाकर वो अमेरिका जाने के लिए तैयार हुए । लॉस एंजिल्स ओलिंपिक में पहले मैच में भारत ने जापान को एकतरफा मुकाबले में 11-1 से हराया ।
इस मैच में 4 गोल ध्यानचंद सिंह ने किये,3 गोल रूप सिंह ने किये, फाइनल में मैच अमेरिका से था, भारत ने इस मैच अमेरिका को उसी के दर्शकों के सामने 24-1 से धो डाला और खिताब जीता । इस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किये, रूप सिंह ने 10 गोल किये। अपने पहले ही ओलिंपिक में 13 गोल करने वाले रूप सिंह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे और भारत दूसरी बार हॉकी में ओलिंपिक गोल्ड मेडल जीतने में सफल हुआ ,लॉस एंजिल्स के बाद भारत ने 37 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले,रूप सिंह के हाथों में बिजली जैसी तेजी आ गयी थी. गेंद स्टिक से लगकर गोली की तरह निकलती थी।
हॉकी में ध्यानचंद और रूप दोनों बेजोड़ थे। ध्यानचंद दिमाग तो रूप सिंह दिल से हॉकी खेलते थे। एक कोख के इन सपूतों ने हॉकी में बेशक देश को अपना सर्वस्व दिया हो पर ओलंपिक के हीरो रूप सिंह को कुछ भी नहीं मिला। गुरबत में जीते आखिर रूप सिंह ने 16 दिसम्बर, 1977 को आंखें मूद लीं।