एजेंसी क्या आप सोच सकते हैं कि एक बॉल टिप वाली कलम किसी अंतरिक्ष अभियान को बचा सकती है। अपोलो 11 अंतरिक्ष यान में बैठकर चांद पर कदम रखने वाले तीन अंतरिक्ष यात्रियों को या तो मौत ले जाती या फिर वे अंतरिक्ष में ही रह जाते, अगर वह बॉल पॉइंट कलम नहीं होती।

नील आर्मस्ट्रॉंग और एडविन ऑल्ड्रिन ने गलती से उस स्विच को तोड़ दिया था जो उन्हें चंद्रमा से वापस धरती पर सफलतापूर्वक लाने के लिए बेहद जरूरी था। लेकिन ऑल्ड्रिन ने चतुराई दिखाते हुए कलम को उस छेद की जगह टिका दिया जहां स्विच था। इससे अंतरिक्ष यान दोबारा चंद्रमा की सतह से उड़ान भरने में कामयाब हो पाया।

एक वृत्तचित्र ने यह खुलासा किया है कि नासा, चंद्रमा अभियान में रूस को पछाड़ना चाहता था क्योंकि रूस अमेरिका से पहले अंतरिक्ष में पहला पुरुष, पहली महिला और जानवर भेजने में कामयाब हो गया था। इसलिए अमेरिका ने अपेक्षा से ज्यादा आशा करके इस अभियान को भेज दिया जो एक बड़े हादसे में तब्दील हो सकता था।

‘द मिरर’ समाचारपत्र ने यहां तक कहा कि उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए अपोलो 11 के तीनों अंतरिक्ष यात्री आर्मस्ट्रॉंग, ऑल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस के मृत्यु की घोषणा कर दी थी। अभी 76 वर्ष के हो चुके ऑल्ड्रिन ने फिल्म निर्माताओं को बताया कि जब स्विच टूटा तो उनका दिल ही बैठ गया था। वह स्विच शायद किसी एक अंतरिक्ष यात्री के भारी अंतरिक्ष पहनावे से लगकर टूट गया होगा।

पृथ्वी से चांद पर अपोलो-11 के रूप में पहला मानव मिशन भेजने का श्रेय अमेरिका के अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र नासा को ही जाता है। 16 जुलाई 1969 को भेजे गए इस मिशन के कमांडर नील एल्डेन आर्मस्ट्रांग थे। वहीं, कमान माड्यूल पायलट माइकल कोलिन्स और लूनर माड्यूल पायलट एडविन यूजेन बज एल्ड्रिन जूनियर थे। जुलाई 1969 की 16 तारीख को कैनेडी स्पेस सेंटर से स्थानीय समयानुसार दोपहर एक बजकर 32 मिनट पर अपोलो-11 का प्रक्षेपण किया गया। यह 12 मिनट बाद अपनी कक्षा में पहुंचा। चंद दिन बाद 20 जुलाई को आर्मस्ट्रांग चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान बन गए। कनफेडरेशन आफ इंडियन एच्ेच्योर एस्ट्रोनामर्स के उपाध्यक्ष नीलेश वायडा ने कहा कि नासा के अंतरिक्ष यान अपोलो-11 का चांद के मिशन पर जाना और वहां आर्मस्ट्रांग का कदम रखना खगोल विज्ञान के क्षेत्र में पिछली सदी की सबसे बड़ी और उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है। वायडा ने कहा कि निश्चित तौर पर इस मिशन से दूसरे देशों के कई अंतरिक्ष अभियानों को प्रेरणा मिली है। अपोलो-11 ने अंतरिक्ष और विशेषकर चांद में खगोलविदें की ज्यादा दिलचस्पी जगाने का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने कहा कि हमारे लिए गर्व की बात यह है कि नासा के चांद पर भेजे गए इस अभियान से कई भारतीय जुड़े हुए थे। मिशन में कोई एक हजार सदस्य शामिल थे जिनमें भारतीयों की भी भागीदारी थी। दरअसल चांद पर अभियान भेजने की परियोजना अमेरिकी राष्ट्रपति रहे जान एफ कैनेडी का सपना थी। 25 मई 1961 को अमेरिकी सदन के संयुक्त सत्र में उन्होंने कहा था कि मेरा मानना है कि इस राष्ट्र को यह दशक खत्म होने से पहले चांद पर मानव को उतारने और उसे सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने का उद्देश्य हासिल करने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करना चाहिए। अपोलो-11 मिशन में खास बात यह थी कि इससे जुड़े सभी सदस्य पहले भी अंतरिक्ष में जा चुके थे। 16 जुलाई 1969 को पृथ्वी से प्रक्षेपण के बाद अपोलो-11 ने 19 जुलाई को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश किया। इसके बाद चंद्रमा के श्क्रेटर सेबिन डीश् से दक्षिण पश्चिम में करीब 20 किलोमीटर दूरी पर एक स्थान यान उतारने के लिए निर्धारित किया गया। यह स्थान इसलिए चुना गया क्योंकि रेंजर-8 और सर्वेयर-5 सर्वेक्षण यानों ने इस क्षेत्र को तुलनात्मक रूप से सपाट पाया था।

20 जुलाई 1969 को अपोलो-11 का एक हिस्सा (ईगल) कमांड माड्यूल कोलम्बिया से अलग हो गया। आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन ने पाया कि वे लक्षित स्थान से कुछ दूरी पर हैं। ह्यूंस्टन स्थित अभियान नियंत्रण केंद्र ने यह संदेश भेजा कि अगर वे लक्ष्य से कुछ दूर भी हैं तब भी वे सुरक्षित हैं। इसके बाद उनका यान 440 मीटर व्यास वाले श्वेस्ट क्रेटर से पूर्वोत्तर में महज 25 सैकंड का ईंधन शेष रहते उतरा। इसके बाद आर्मस्ट्रांग ने कहा कि ईगल उतर चुका है। चांद की सतह को पाउडर की तरह करार देने के बाद आर्मस्ट्रांग ईगल से बाहर निकले और बाहरी दुनिया में कदम रखने वाले पहले मानव बन गए। उन्होंने कहा कि यह मानव के लिए एक छोटा कदम, पर मानव जाति के लिए एक बड़ी छलांग है। वैसे, चांद पर अपोलो-11 और उसके अंतरिक्ष यात्रियों के उतरने के बाद यह रिपोर्ट भी आईं कि अभियान झूठा था। इसके पीछे दलीलें दी गईं कि चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों की जो तस्वीरें खीचीं गईं उनमें प्रकाश के विभिन्न स्रोत नजर आ रहे थे। यह भी कहा गया कि जब चांद का अपना कोई मौसम नहीं है तो अमेरिका का ध्वज कैसे लहरा रहा था तथा वहां गुरुत्वाकर्षण बल नहीं होने के चलते आर्मस्ट्रांग के कदम रखने पर वहां इतना सटीक निशान कैसे बन गया। इस पर खगोलविद वायडा कहते हैं कि मैं इन दलीलों को दमदार नहीं मानता। अमेरिका में चलन है कि कोई भी बड़ी घटना होने पर उसे गलत साबित करती रिपोर्ट आने लग जाती हैं। अपोलो-11 के चांद पर उतरने में हमें कोई संदेह नजर नहीं आता।

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