जयंती पर विशेष-अंग्रेजी उपन्यासकार वर्जीनिया वूल्फ  का 25 जनवरी, 1882 को लंदन के केनसिंगटन में जन्म हुआ था।वर्जीनिया वुल्फ का असली नाम एडेलीन वर्जिनिया वुल्फ था। वर्जनिया के पिता सर स्टीफन इतिहासकार और पर्वतारोही थे वहीं उनकी मां जूलिया प्रसिद्ध सुंदरी थीं । 1912 में उनकी शादी लियोनॉर्ड से हुई और उन्होंने लंदन के लेखकों के बहुत ही प्रतिष्ठित ब्लूम्सबरी ग्रुप में काम करना शुरु किया।1895 में मां की अचानक मौत हो जाने के बाद विर्जिनिया मानसिक बीमारी से की गिरफ्त में आने लगी थी।वर्जीनिया ने बहुत कम उम्र से ही लिखने की शुरुआत कर दी थी। लेखिका को लेखन की प्रतिभा और हुनर विरासत में मिली थी।न्होंने इंग्लिश क्लासिक्स से लेकर विक्टोरियन लिटरेचर तक को पढ़ा और दुनिया भर में महिलाओं को लेखन और जीवन जीने के बिंदास सूत्र दिए. वे न सिर्फ पश्चिम में ही लोकप्रिय थीं, बल्कि दुनिया भर में उनकी लेखनी का जादू सिर चढ़कर बोला.उनका पहला उपन्यास ‘द वॉयज आउट’ 1915 में प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास को उनके पति लियोनार्ड वुल्फ के प्रकाशन संस्थान हॉगर्थ प्रेस ने छापा था. उनके श्रेष्ठ उपन्यासों में ‘मिसेज डैलोवे (1925)’, ‘टू द लाइटहाउस (1927)’, ‘ऑरलैंडो (1928)’ खास तौर से पहचाने जाते हैं. उन्होंने एक लंबा निबंध ‘अ रूम ऑफ वन्स ओन’ भी लिखा, जिसमें उनका कहना था कि अगर औरतों का फिक्शन लिखना है तो औरत के पास अपना पैसा और कमरा होना चाहिए.वर्जिनिया वुल्फ की किताब ‘ऑरलैंडो’ , ‘मिसेज डैलोवे’ पर फिल्म भी बन चुकी है। 1997 में बनी इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था और यह बेहतरीन फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल है। उनकी कई कहानियों को टीवी पर उकेरा गया. उनके लेटर्स पर ‘वीटा और वर्जिनिया’ पर पोस्ट प्रोडक्शन में काम चल रहा है.उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें मार्गरेट एटवुड और गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज की श्रेणी में रखा जाता है. वर्जीनिया वुल्फ का काम 1970 के फेमिनिस्ट मूवमेंट में आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणास्रोत था.
वर्जीनिया की मौत उनकी जिंदगी जितनी ही त्रासदी से भरी हुई है. उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. उन्होंने ससेक्स के अपने घर के पास की नदी में खुद को डुबा लिया था. अवसाद की स्थिति में उन्होंने 28 मार्च 1941 में नदी में छलांग लगा दी थी  उस वक्त वो महज 59 साल की थीं. उस वक्त उन्होंने डायरी लिखी थी और अपने पति को लिखे उनके आखिरी पत्र से पता चलता है कि वो कितने गहरे अवसाद में डूबी हुई थीं. उनकी डायरियों से पता चलता है कि वो मौत के प्रति कितनी आसक्त होती जा रही थीं.

उन्होंने अपने पति को जो पत्र लिखा था, उसे पढ़कर कोई भी टूट सकता है. उन्होंने लिखा था.

‘प्रियतम, मुझे यकीन है कि मैं फिर से पागल हो रही हूं. मुझे लगता है कि इस बार हम हमेशा की तरह इस मुश्किल वक्त से नहीं गुजर पाएंगे. मैं इस बार इससे नहीं उबर पाऊंगी. मुझे आवाजें सुनाई दे रही हैं और मैं ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही हूं. इसलिए मैं वो कर रही हूं जो मैं इससे बेहतर कर सकती हूं. तुमने मुझे सबसे बड़ी खुशी दी है. तुम हर तरह के वक्त में मेरे साथ रहे. मुझे नहीं लगता इस बीमारी के आने से पहले हम जितने खुश थे, उससे ज्यादा दो लोग एक दूसरे के साथ खुश रह सकते हैं. लेकिन अब मैं इससे ज्यादा और नहीं लड़ सकती. मुझे पता है मैं तुम्हारी जिंदगी बरबाद कर रही हूं और अगर मैं न रहूं तो तुम अपना काम अच्छी तरह कर पाओगे. तुम देख ही रहे हो कि मैं अब न सही से लिख पाती हूं, न पढ़ पाती हूं. मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि मेरी जिंदगी की खुशी बस तुमसे है. तुम मेरे साथ बहुत ही सब्र के साथ और आश्चर्यजनक रूप से प्यार से रहे हो. मैं ये कहना चाहती हूं और सब ये जानते हैं. अगर मुझे बचाने की किसी के पास क्षमता होती, तो वो तुम होते. मैं सबकुछ खोती जा रही हूं लेकिन ये मुझे पता है कि तुम कितने अच्छे हो. लेकिन अब मैं तुम्हारी जिंदगी और बरबाद नहीं कर सकती. मुझे नहीं लगता कि हम साथ में जितने खुश रहे, उतना कोई हो सकता है.’

अपने पति के नाम इस खत को लिखने के बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. वर्जीनिया वुल्फ की जगह अब भी साहित्य की दुनिया में कोई नहीं ले सकता.एजेन्सी। 

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