“लखनऊ है तो महेज़ गुंबद-ओ मीनार नहीं,सिर्फ एक शहर नहीं कूचा-ओ बाज़ार नहीं,
इसके आंचल में मोहब्बत के फूल खिलते हैं,इसकी गलियों में फ़रिश्तों के पते मिलते हैं” -डॉ.  योगेश प्रवीण

डॉ. योगेश प्रवीण लखनऊ के साथ-साथ अवध और इसकी संस्कृति, साहित्य और इतिहास के जीवित किंवदंती के रूप में जाने जाते हैं। वे लखनऊ के लिए काम कर रहे थे  जो अपनी दुर्लभ संस्कृति और परंपरा, अपनी सुबोध भाषा, अपने शिष्टाचार और शिष्टाचार की कोमलता, अपने सामंजस्यपूर्ण समाज और अनूठी जीवन शैली के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। वे क प्रख्यात लेखक, कल्पनाशील, कहानीकार,  संवेदनशील कवि, निबंधकार और  जीवंत वक्ता थे।  उन्हें अपनी माँ, (स्वर्गीय) श्रीमती रमा श्रीवास्तव थी से प्रेरणा मिली, जो अपने समय की  प्रख्यात कवयित्री थीं।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में दास्तान-ए अवध, ताजदार-ए अवध, बहार-ए अवध, गुलिस्तां-ए अवध, डूबता अवध, दास्तान-ए लखनऊ, आपका लखनऊ, लखनऊ स्मारक (अंग्रेजी), साहिब-ए आलम आदि शामिल हैं। उनकी काव्य रचनाओं में शबनम (उर्दू), पीले गुलाब (उर्दू), अंजुमन (गजल), इंद्र धनुष (गीत) और सुमनहार शामिल हैं। उन्हें 1973 में मयूर पंख के लिए बाल कृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार और अपराजिता पुस्तक के लिए यूपी हिंदी संस्थान का तुलसी पुरस्कार मिला। वे धर्मयुग,  हिंदुस्तान, सारिका, कादम्बिनी , नवनीत, नंदन के एक प्रमुख लेखक और लखनऊ महोत्सव की पत्रिका उर्मिला के पच्चीस वर्षों तक संपादक रहे।

उन्होंने फीचर और नाटकों में विशेषज्ञ वक्ता के रूप में आकाशवाणी में पैंतीस वर्षों तक बहुत काम किया है। उन्होंने टेलीविजन मीडिया में लिखा है और कुछ प्रसिद्ध वृत्तचित्रों और फिल्मों में बहुत काम किया है। शतरंज के खिलाड़ी, जुनून, उमरावजान और ज़हरे इश्क जैसी फ़िल्मों को उनके शोध का श्रेय दिया जाता है। उनके गीतों को बॉलीवुड के कुछ शीर्ष गायकों ने गाया है, जैसे आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा, अनूप जलोटा, उदित नारायण और उषा अमौकर, आदि। उनके नाटक आज भी स्टेज शो के रूप में खेले जाते हैं, जो पूरे भारत में लोगों को लुभाते और आकर्षित करते हैं। उन्हें 1996 में कला संस्कृति सम्मान और 1997 में प्रसार भारती हिंदी उर्दू अदब पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके अन्य पुरस्कारों में यूपी संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1998), राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार (1999), यूपी रत्न पुरस्कार (2000), यूपी सरकार द्वारा कला भूषण सम्मान, हिंदी संस्थान (2002) और यश भारती पुरस्कार (2006) शामिल हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी व्याख्याता हेम अंशु सेन को उनकी रचनाओं के लिए योगेश प्रवीण विषय पर पीएचडी (2003) से सम्मानित किया गया है।

पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीण 12 अप्रैल 2021 को   82 साल की उम्र में अलविदा कह गए थे । 13  अप्रैल 2021 को पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीण का भैंसाकुंड स्थित बैकुंठ धाम पर अंतिम संस्कार किया गया था।

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